
Surat Family Friendship: ऐसी दुनिया में जहां दोस्ती अब चैट बॉक्स तक सिमट गई है, क्या वाकई कोई रिश्ता समय, मौत और हालात की सीमाओं से परे जा सकता है? सूरत के भटार इलाके में बसे 'मैत्री' नामक एक बंगले में इसका जवाब मिलता है-एक दोस्ती जो 1940 में शुरू हुई और आज चौथी पीढ़ी में भी उतनी ही मजबूत है।
सूरत के सागरमपुरा में रहने वाले दो किशोर-बिपिन देसाई और गुणवंत देसाई ने एक सरकारी स्कूल में दोस्ती की शुरुआत की। स्कूल की घंटियों से लेकर घर के खाने और सपनों की बातों तक, दोनों की जिंदगियाँ एक-दूसरे में घुल-मिल गईं।
1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तो इन दोनों दोस्तों ने निडर होकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पर्चे बाँटना हो या जेल जाना—इनका साथ कभी नहीं टूटा। यहीं से शुरू हुआ वो भरोसा, जो आज तक कायम है।
आज़ादी के बाद दोनों पुणे के कृषि विश्वविद्यालय से पढ़कर लौटे और फिर शुरू हुआ जीवन का असली सफर। खेती, डेयरी, ठेकेदारी और अन्य व्यवसायों में इनका साझा हाथ रहा। साझेदारी इतनी गहरी थी कि कभी विवाद तक नहीं हुआ।
अब बिपिन और गुणवंत के बेटों ने भी यह दोस्ती आगे बढ़ाई। अब उनके पोते और परपोते भी ‘मैत्री’ बंगले में रहते हैं और एक ही परिवार की तरह त्योहार, शादी-ब्याह और हर कठिनाई को साथ में जीते हैं।
इस कहानी से एक बड़ा सवाल उठता है-क्या आज के जमाने में भी कोई रिश्ता इतना मजबूत हो सकता है? जवाब है हां-अगर उसमें भरोसा, समर्पण और साझी परंपराएं हों। सूरत के इन दो परिवारों की कहानी हमें यही सिखाती है। ‘मैत्री’ बंगला सिर्फ एक इमारत नहीं, एक विरासत है। सूरत के इस अनसुने रिश्ते ने साबित कर दिया कि सच्ची दोस्ती न तो समय की मोहताज है, न परिस्थितियों की और न ही मृत्यु की।
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