Marhi Mata Mandir : देश में कई ऐसे मंदिर हैं जिनसे भक्तों की गहरी आस्था जुड़ी है। इन मंदिरों से जुड़े चमत्कार आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही चमत्कारी मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो छत्तीसगढ़ में स्थित है।

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं। देश भर में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके चमत्कार विज्ञान को भी हैरान कर देते हैं। कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जो न तो शक्ति पीठ हैं और न ही सिद्ध पीठ, फिर भी वहां होने वाले चमत्कारों की वजह से भक्तों की उनमें गहरी आस्था है। ऐसा ही एक चमत्कारी मंदिर छत्तीसगढ़ में है, जहां भक्त अपनी मुरादें लेकर दूर-दूर से आते हैं।

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संतान का वरदान देने वाला मंदिर

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में न्यू रेलवे कॉलोनी के पास जंगलों के बीच मरही माता का मंदिर है। स्थानीय लोग इसे एक चमत्कारी मंदिर मानते हैं। मान्यता है कि अगर कोई निसंतान दंपत्ति यहां आकर देवी का आशीर्वाद ले, तो उनकी मुराद पूरी हो जाती है और जल्द ही उनके घर में बच्चे की किलकारियां गूंजने लगती हैं। इसी विश्वास के साथ यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां निसंतान दंपत्ति मंदिर परिसर में मौजूद एक पेड़ पर मन्नत मांगते हैं और उनकी मुरादें पूरी हो जाती हैं।

श्मशान में वास करती हैं माता

मरही माता को श्मशानवासिनी (श्मशान में रहने वाली) भी कहा जाता है, क्योंकि यहां तंत्र-मंत्र की सिद्धि के लिए भी विशेष पूजा होती है। मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से बड़े से बड़े तांत्रिक प्रयोगों का असर खत्म हो जाता है और बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है। निसंतान दंपत्ति यहां विशेष पूजा के लिए आते हैं और मन्नत पूरी होने पर अपनी श्रद्धा के अनुसार दान और पूजा-पाठ करते हैं। मंदिर परिसर में एक पुराना पेड़ भी है, जिसे "मन्नत का पेड़" कहा जाता है। लोग इस पेड़ पर लाल धागे बांधकर अपनी मुरादें मांगते हैं।

चमत्कार के पदचिह्न

मंदिर परिसर में देवी मां के अलग-अलग रूपों की कई पत्थर की मूर्तियां हैं। यहां काली, दुर्गा और सरस्वती की मूर्तियों के साथ एक शिवलिंग भी स्थापित है। मंदिर में चरण पादुका यानी पैरों के निशान भी मौजूद हैं। इसके अलावा, मंदिर के मुख्य गर्भगृह में देवी की मूर्ति कई तरह के हथियारों और भुजाओं से सजी हुई है। नवरात्रि के दिनों में मरही माता मंदिर में मां का आशीर्वाद लेने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

1901 से जुड़ा है इस मंदिर का इतिहास

स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर का इतिहास 1901 से जुड़ा है और यहां स्थापित माता की मूर्ति स्वयंभू (खुद प्रकट हुई) है। कहा जाता है कि माता की यह मूर्ति धरती फाड़कर निकली थी। पौराणिक कथा के अनुसार, एक आम आदमी को रेलवे स्टेशन के पास यह मूर्ति आधी दबी हुई मिली थी। बाद में, रेलवे के एक रिटायर्ड कर्मचारी, स्वर्गीय सदानंद आचारी ने यहां माता को समर्पित मंदिर का निर्माण करवाया।