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एक वोट की कीमत: 24 साल पहले हुआ था सबसे मुश्किल चुनाव, रामायण की 'सीता' दीपिका यहीं से बनी थीं सांसद

जो सोचते हैं कि एक अकेले वोट से कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें 24 साल पहले गुजरात की बड़ौदा या बड़ोदरा (Vadodara Lok Sabha constituency) लोकसभा सीट पर हार-जीत के अंतर को देख लेना चाहिए।

One Vote Importance Know how Vadodara Lok Sabha constituency result was difficult in 1996
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New Delhi, First Published Sep 24, 2020, 7:41 PM IST
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नई दिल्ली। बिहार में 243 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव (Bihar Assembly Elections) की सरगर्मियां तेज हैं। हालांकि अभी चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं हुआ है, मगर बिहार के साथ ही साथ कुछ राज्यों में भी नवंबर के आखिर तक उपचुनाव होना तय है। चुनाव लोकतांत्रिक देशों में एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए मतदाता उम्मीदों पर खरा न उतरने वाले दलों, प्रतिनिधियों को हराने या जिताने का अधिकार पाते हैं। जनता के यही प्रतिनिधि सरकार बनाते और चलाते हैं। लोकतंत्र में सरकार और सिस्टम का कंट्रोल जनता को वोट की शक्ति के जरिए मिलता है। जो सोचते हैं कि एक अकेले वोट से कोई फर्क नहीं पड़ता (One Vote Importance) उन्हें 24 साल पहले गुजरात की बड़ौदा या बड़ोदरा (Vadodara Lok Sabha constituency) लोकसभा सीट पर हार-जीत के अंतर को देख लेना चाहिए।

बड़ौदा सीट गुजरात की हाईप्रोफाइल सीट में शुमार है। और इसकी वजह भी है। रॉयल गायकवाड़ फैमिली (Gaekwad dynasty) के लोग यहां से सांसद बनते रहे हैं। देश की आजादी से पहले बड़ौदा रियासत थी और यहां गायकवाड़ परिवार का राज था। आजादी के बाद रिसायत का भारत में विलय हो गया और बॉम्बे स्टेट का हिस्सा बना। यहां 1957 में कांग्रेस (Congress) के टिकट पर रॉयल फैमिली से पहली बार फतेहसिंह गायकवाड़ सांसद बने थे। उन्होंने दूसरा चुनाव भी जीता था। मजेदार यह है कि गायकवाड़ फैमिली की तीन पीढ़ियों ने यहां से प्रतिनिधित्व किया है। इस सीट की एक और दिलचस्प बात है। रामानंद सागर (Ramanand Sagar) के रामायण (Ramayan) की सीता के रूप में घर-घर पहचानी गई दीपिका चिखलिया (Deepika Chikhalia) भी बीजेपी सांसद के रूप में 1991 में यहां चुनाव जीत चुकी हैं। ये बीजेपी की पहली जीत थी। 

कभी कांग्रेस का गढ़ थी बड़ौदा 
यहां 1957 से 2019 तक कई चुनाव हुए, मगर सबसे दिलचस्प मुक़ाबला 1996 में हुआ था। तब कांग्रेस के साथ ही गायकवाड़ फैमिली अपना वजूद बचाने उतरी थी। 1957 से 1991 तक इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ दिया जाए तो यहां कांग्रेस और गायकवाड़ फैमिली का ही वर्चस्व रहा। 1991 में बीजेपी ने ये सीट जीतकर वर्चस्व को चुनौती दी थी। 1996 के चुनाव में यही वजूद बचाने का संघर्ष दिखा और एक-एक वोट का महत्व भी समझ में आया था। 

कांग्रेस के सामने थी किला बचाने की चुनौती 
1991 के चुनाव में कांग्रेस ने अपना किला बचाने के लिए सत्यजीत गायकवाड़ (Satyajit Gaekwad) को अपना उम्मीदवार बनाया था। बीजेपी ने भी दीपिका की जगह जितेंद्र सुखाड़िया (Jitendra Sukhadia) को मैदान में उतारा था। ये चुनाव न सिर्फ बड़ौदा बल्कि गुजरात के इतिहास में सबसे रोमांचक था। दोनों उम्मीदवारों के बीच जबरदस्त टक्कर हुई। राममंदिर आंदोलन और प्रधानमंत्री के रूप में अटलबिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) के नाम की वजह से चुनाव का पूरा कैम्पेन दिलचस्प हो गया था। बीजेपी किसी भी तरह ये सीट बचाना चाहती थी। वहीं 1989 और 1991 का चुनाव हार चुकी कांग्रेस की कोशिश थी कि गढ़ को कैसे भी वापस ले लिया जाए। 

 

काउंटिंग में दिखी कांटे की लड़ाई, समझ आया एक-एक वोट का महत्व  
बड़ौदा में कांटे की लड़ाई काउंटिंग में नजर आने लगी। काउंटिंग में हर पल नतीजे बदल रहे थे। मुक़ाबला इतना नजदीकी होता जा रह था कि बीजेपी और कांग्रेस उम्मीदवार में कौन जीतेगा इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल हो गया था। आखिर में मात्र 17 वोट से कांग्रेस के सत्यजीत गायकवाड़ को विजेता घोषित किया गया। हालांकि बीजेपी उम्मीदवार को अपनी हार पर भरोसा नहीं था। रीकाउंटिंग के बाद भी सुखाड़िया 17 वोट से पीछे ही रह गए। बेहद नजदीकी मुक़ाबले में सीट गंवाने वाले सुखाड़िया से बेहतर भला कौन बता सकता है कि एक-एक वोट की कीमत क्या होती है। उस चुनाव में सत्यजीत को 1,31,248 और सुखाड़िया को 1,31,231 वोट मिले थे। 1996 के बाद बड़ौदा में कांग्रेस आजतक नहीं जीत पाई है। 1998 से 2019 तक लगातार ये सीट बीजेपी के कब्जे में है। 

वैसे 1996 में बीजेपी और सहयोगी सबसे बड़े मोर्चे के रूप में सामने आए। प्रेसिडेंट शंकर दयाल शर्मा (Shankar Dayal Sharma) ने उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। वाजपेयी ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई। मगर बहुमत नहीं होने की वजह से 13 दिनों में उनकी सरकार का पतन हो गया और फिर कांग्रेस के सहयोग से संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी। दो प्रधानमंत्री बदलने के बावजूद मोर्चा सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और देश को मध्यावधि चुनाव का सामना करना पड़ा। 

पीएम मोदी यहां से जीत चुके हैं चुनाव 
जाते-जाते यह भी जान लीजिए कि 2014 में पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने भी वाराणसी के अलावा बड़ौदा से चुनाव लड़ा था। बाद में उन्होंने बड़ौदा सीट छोड़ दी थी और उपचुनाव में रंजनाबेन भट्ट विजयी हुई थीं। 

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