नई दिल्ली। बिहार में विधानसभा (Bihar Polls 2020) चुनाव की घोषणा हो चुकी है। इस बार राज्य की 243 विधानसभा सीटों पर 7.2 करोड़ से ज्यादा वोटर मताधिकार का प्रयोग करेंगे। 2015 में 6.7 करोड़ मतदाता थे। कोरोना महामारी (Covid-19) के बीचे चुनाव कराए जा रहे हैं। इस वजह से इस बार 7 लाख हैंडसैनिटाइजर, 46 लाख मास्क, 6 लाख PPE किट्स और फेस शील्ड, 23 लाख जोड़े ग्लब्स इस्तेमाल होंगे। यह सबकुछ मतदाताओं और मतदानकर्मियों की सुरक्षा के मद्देनजर किया जा रहा है। ताकि कोरोना के खौफ में भी लोग बिना भय के मताधिकार की शक्ति का प्रयोग कर सकें। बिहार के चुनाव समेत लोकतंत्र में हर एक वोट की कीमत है।

खूबसूरत द्वीप के रूप में मशहूर लक्षद्वीप (Lakshadweep Lok Sabha constituency) और दो चीजों की वजह से जाना जाता है। एक तो ये संघशासित क्षेत्र है। दूसरा लोकसभा में कांग्रेस (Congress) के दिग्गज नेता पीएम सईद ( PM Sayeed) ने रिकॉर्ड वक्त तक इसका प्रतिनिधित्व किया। 1957 और 1962 के पहले चुनाव को छोड़ दिया जाए तो 1967 से 2004 तक यहां से सईद जीत रहे थे। सईद ने लगातार 10 बार यहां से चुनाव जीता है जो अपने आप में रिकॉर्ड है। सईद ने यहां पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था। बाद में वो इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में करते रहे। हालांकि 1980 में एक बार उन्होंने INC (Urs) उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव जीता। 

लक्षद्वीप में सईद ही थे कांग्रेस 
पीएम सईद की वजह से लक्षद्वीप को कांग्रेस का अभेद्य किला मान लिया गया था। आपातकाल के बाद चाहे कांग्रेस विरोधी लहर हो या 1989 में बोफोर्स को लेकर गांधी परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप। सईद के चुनाव पर कभी किसी राष्ट्रीय मुद्दे का फर्क नहीं पड़ा। लक्षद्वीप के लिए सईद ही कांग्रेस थे। लेकिन 2004 के रोमांचक चुनाव में पहली बार वो करिश्मा हुआ जिसकी किसी ने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी।  2004 के आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इंडिया शाइनिंग के नारे का शोर था। माना जा रहा था कि चुनाव बाद एक बार फिर से वाजपेयी सरकार की वापसी होगी। 

 

मतगणना रुझानों पर नहीं हो रहा था भरोसा 
एनडीए ने हर लोकसभा सीट पर इसकी तैयारी भी की थी। लक्षद्वीप की सीट जनता दल यूनाइटेड (JDU) के खाते में थी। जेडीयू ने पेशे से डॉक्टर और सोशलवर्कर  पी पूकुन्ही कोया (P Pookunhi Koya) को सईद के खिलाफ उम्मीदवार बनाया था। पहले चुनाव एकतरफा माना जा रहा था, लेकिन कोया के कैम्पेन से मामला रोमांचक दिखने लगा। हालांकि उस चुनाव में लक्षद्वीप पर देश की नजर सिर्फ इस बात को लेकर ही थी कि लगातार 11वीं बार सईद कितने वोटों की मार्जिन से चुनाव जीतते हैं। मतदान के बाद जब काउंटिंग शुरू हुई तो रुझानों ने लोगों को हैरान कर दिया। 

71 वोट से कोया ने भेद दिया सईद का किला 
दरअसल, कोया के आगे सईद नजदीकी मुक़ाबले में जूझते दिख रहे थे। सईद के लिए राजनीतिक जीवन में पहली बार बेहद मुश्किल लड़ाई का सामना करना पड़ रहा था। एक पर एक जैसे-जैसे काउंटिंग के दौर पूरे होने लगे मुक़ाबला और नजदीकी होता जा रहा था। आखिरी राउंड तक पहुंचते पहुंचते मामला इतना पेंचीदा हो गया कि अजेय दिख रहे सईद पर हार का खतरा मंडराने लगा। आखिर में वही हुआ जिसके बारे में लोगों ने सोचा तक नहीं था। एक डॉक्टर के हाथों लगातार 10 जीत हासिल करने वाले दिग्गज पीएम सईद हार चुके थे। उनकी हार सिर्फ और सिर्फ 71 वोट से हुई थी। चुनाव में एक-एक वोट की क्या कीमत है इसे 2004 में सईद की हार से समझा जा सकता है। हालांकि कोया 2019 के चुनाव में अपनी जीत नहीं दोहरा पाए। 2019 में सईद के बेटे मोहम्मद हमदुल्ला सईद (Muhammed Hamdulla Sayeed) ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में ये सीट वापस ले ली। इसके बाद 2014 और 2019 में ये सीट एनसीपी (NCP) सांसद मोहम्मद फैजल पीपी ( Mohammed Faizal PP) के पास है। चुनाव में एनडीए (NDA) सरकार को बहुमत नहीं मिला।