बेगूसराय। कोरोना के कहर से सबसे ज्यादा परेशानी उस वर्ग को हुई है, जो रोजी-रोटी की तलाश में घर से दूर हैं। ये वो वर्ग रोज कमाकर खाता है। 24 मार्च से लॉकडाउन में जब फैक्टियां-बाजार बंद हुए तो इनकी रोजी-रोटी छिन गई। जो जहां थे वहीं फंस गए। जो थोड़ी-बहुत बचत थी, उससे कुछ दिनों तक दाना-पानी मिलता रहा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए समस्याएं बढ़ती गईं। 3 मई को लॉकडाउन में मिली ढील के बाद देश के विभिन्न राज्यों से श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई जाने लगी। जिससे बिहार-यूपी, बंगाल सहित अन्य राज्यों के प्रवासी मजदूर वापस लौट रहे हैं। 

सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई ये तस्वीर
लॉकडाउन के बीच लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर सड़क पर है। कोई पैदल तो कोई कर्ज पर पैसे लेकर निजी साधनों से अपने घर का रास्ता नाप रहा है। इन प्रवासी मजदूरों की कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुईं और अभी भी हो रही हैं। ये तस्वीरें प्रवासी मजदूरों की पीड़ा और कोरोना के कहर की पोस्टर सरीखी हैं। ऊपर जो तस्वीर आप देख रहे हैं वो भी एक प्रवासी मजदूर है। तेज धूप में कान में मोबाइल सटाए बिलखते इस मजदूर की तस्वीर बीते चार-पांच दिनों से सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुई। 

तेजस्वी यादव ने ट्विटर पर प्रोफाइल बनाया
बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस मजदूर की तस्वीर को ट्विटर पर अपना प्रोफाइल पिक बनाया है। वायरल तस्वीर को तो आप पहले भी देख चुके होंगे। अब इस तस्वीर के पीछे की कहानी जानिए। कान में मोबाइल सटाए बिलखता यह मजदूर बिहार के बेगूसराय जिले का निवासी है। इस शख्स का नाम रामपुकार पंडित है। जो दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में मजदूरी करता था। रामपुकार की यह तस्वीर तब ली गई जब वो निजामुद्दीन पुल पर फोन पर बात करते हुए जार-जार रो रहा था। 

सही इलाज के अभाव में बेटे की हो गई मौत
बेगूसराय के बरियारपुर निवासी रामपुकार पंडित लॉकडाउन के कारण दिल्ली में फंसा था। इस बीच घर पर उसके बेटे की तबियत खराब हो गई। बेटे की बीमारी की बात सुन वो घर जाने को निकला। लेकिन निजामुद्दीन पुल पर पुलिस ने उसे रोक लिया। रामकुमार वहीं पुल पर तीन दिनों तक फंसा रहा। इस बीच उसके बेटे की मौत हो गई। अपनी इस व्यथा पर परिजनों से बात करते हुए जब वो रो रहा था, तभी PTI के फोटोग्राफर ने उसकी यह तस्वीर उतारी। रामकुमार की ये तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई। 

बिहार तो आया लेकिन आखिरी बार नहीं देखा सका बेटे को 
बिहार में बेटे की मौत के बाद जब उसने पुलिस और मीडिया को अपनी कहानी बताई तो वहां मौजूद लोगों की आंखें भर आई। पुलिस ने उसे दिल्ली स्टेशन पहुंचाया। श्रमिक स्पेशल ट्रेन से रामकुमार को बिहार भेजा गया। अब रामकुमार बिहार तो आ गया है लेकिन न तो अपने बेटे का अंतिम दर्शन कर सका और न अभी तक अपने परिवार से मिल सका है। उसे उसके होमटाउन में बनाए गए क्वारेंटाइन सेंटर में रखा गया है। बिहार सरकार ने कोरोना संक्रमण पर लगाम के लिए प्रवासी मजदूरों को 14 दिनों तक क्वारेंटाइन सेंटर में रखने की व्यवस्था की है।