कार्नेगी इंडिया के ग्लोबल टेक्नोलॉजी समिट इनोवेशन डायलॉग 2025 में चर्चा हुई कि AI और कंप्यूटिंग का भविष्य सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि सॉवरेनिटी, स्मार्ट डिजाइन और संस्कृति से भी जुड़ा है। देशों को अपने सिस्टम सुरक्षित रखने AI मॉडल बनाने की जरूरत है।

लेखक: श्रुति मित्तल

Carnegie India Global Technology Summit 2025: विदेश मंत्रालय के साथ कार्नेगी इंडिया (Carnegie India) का ग्लोबल टेक्नोलॉजी समिट इनोवेशन डायलॉग 2025 (Global Technology Summit Innovation Dialogue 2025)आयोजित किया गया, जो इंडिया एआई इंपैक्ट समिट 2026 (India AI Impact Summit 2026) का प्री-समिट इवेंट था. इसमें इस साल AI और टेक्नोलॉजी इनोवेशन पर कई अहम मुद्दों पर चर्चाएं हुईं. इस इवेंट का एक खास सेशन 'The Spine that Powers Use-Cases: Compute and its Discontents' रहा. इस पैनल में बताया गया कि कैसे कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर हमारी AI योजनाओं और इनोवेशन को प्रभावित करता है। यहां अफ्रीका में रिन्यूएबल डेटा सेंटर बनाने, सरकारों को डिजिटल बदलाव में मदद करने और भारत में AI और डिजिटल पब्लिक गुड्स को आगे बढ़ाने के अनुभव शेयर किए गए। इस चर्चा से तीन मुख्य बातें सामने आईं।

सॉवरेनिटी और डिपेंडेंसी का खतरा

आज कंप्यूटिंग यानी कंप्यूटर पावर हर देश के लिए जरूरी हो गई है। अगर देश के पास खुद की क्षमता नहीं होगी, तो बाहरी प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह निर्भर होना पड़ेगा। इसका मतलब यह है कि प्लेटफॉर्म बंद होने पर काम रुक सकता है। स्टार्टअप्स को अचानक नुकसान हो सकता है जब ग्लोबल कंपनियां नियम बदल देती हैं। सरकारों को सोचना होगा कि क्लाउड और अपने खुद के सिस्टम में संतुलन कैसे रखें। सेंसेटिव डेटा, जैसे कि डिफेंस, हेल्थ या इंटेलिजेंस रिकॉर्ड, पूरी तरह बाहरी प्लेटफॉर्म पर छोड़ना सुरक्षित नहीं। वहीं, अचानक मांग बढ़ने पर क्लाउड की जरूरत भी पड़ सकती है। इसका सॉल्यूशन लेयरड स्ट्रेटेजी है, जो देश की अपनी कोर क्षमता, एज-सॉल्यूशंस और चुनिंदा क्लाउड इस्तेमाल का बैलेंस का कॉम्बिनेशन होती है.

स्मार्ट इंजीनियरिंग, ज्यादा पावर नहीं

AI मॉडल बहुत कंप्यूटिंग पावर मांगते हैं, लेकिन हर काम के लिए सबसे ज्यादा पावर की जरूरत नहीं है। पब्लिक हेल्थ में आम सवालों को कैश करना या मॉडल को मोबाइल पर चलाना खर्च कम कर सकता है। हमेशा सटीकता बढ़ाने के चक्कर में पैसा और समय बर्बाद हो सकता है। उदाहरण के लिए, 90% सही रिजल्ट वाला स्क्रीनिंग टूल भी काम कर सकता है, अगर वह समय पर सही लोगों तक मदद पहुँंचाए। सबसे बड़ी बात कि कंप्यूटिंग सिर्फ मदद करने का जरिया है, खुद का उद्देश्य नहीं। इनोवेटर्स को अब कम संसाधन में काम करने वाले सिस्टम डिजाइन करना चाहिए।

Models और Cultural Imprint

पैनल ने यह भी कहा कि AI मॉडल्स न्यूट्रल नहीं होते। वे उन समाजों के मूल्यों और धारणाओं को प्रतिबिंबित करते हैं जिन्होंने उन्हें बनाया है। उदाहरण के लिए अफ्रीकी संस्कृति में बड़ों के प्रति सम्मान गहरा है, लेकिन अगर मॉडल बाहर विकसित किया गया हो तो यह मान्यता उसमें नहीं दिखेगी। अगर कंप्यूटिंग क्षमता कुछ ही क्षेत्रों में केंद्रित रही, तो डिजिटल दुनिया में उन क्षेत्रों की सांस्कृतिक प्राथमिकताएं हावी हो जाएंगी। इसलिए केवल तकनीकी सॉवरेनिटी ही नहीं, बल्कि स्थानीय भाषाओं, नियमों और सांस्कृतिक संदर्भों को मॉडल्स में शामिल करना भी जरूरी है।

प्रैक्टिकल एजेंडा

कार्नेगी इंडिया की इस चर्चा ने यह स्पष्ट किया कि सॉवरेन क्षमता, डिजाइन और सांस्कृतिक इमेज सिर्फ विचार नहीं, बल्कि वास्तविक चुनौतियां हैं। अगर इन्हें सही से संभाला नहीं गया, तो AI समाधान पायलट तक ही सीमित रह सकते हैं। मतलब सिर्फ टेक्नोलॉजी बनाना ही काफी नहीं है। सरकारों को इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना चाहिए, जो फ्लैक्सिबिलिटी और सेफ्टी दोनों दे। इनोवेटर्स को सीमित संसाधन में काम करने वाले सिस्टम डिजाइन करने चाहिए। सामाजिक नजरिए से भी यह समझना जरूरी है कि कंप्यूटिंग सिर्फ पावर नहीं है, बल्कि यह तय करता है कि कौन से मूल्य डिजिटल दुनिया में आगे बढ़ेंगे।

श्रुति मित्तल कौन हैं

इस आर्टिकल को लिखने वाली श्रुति मित्तल कार्नेगी इंडिया में एक रिसर्च एनालिस्ट हैं। उनका मौजूदा रिसर्च फील्ड आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर्स, कंप्यूट और डेटा गवर्नेंस से जुड़ा है। इसके अलावा, उन्हें यह भी जानने में दिलचस्पी है कि तकनीकों का खुला विकास और उनका प्रसार ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) में सामाजिक और आर्थिक रूप से कितना फायदा दे सकता है।