IIT के दीपिंदर गोयल और पंकज चड्ढा ने 2008 में 'फूडीबे' शुरू किया, जो ज़ोमैटो बना। 2015 में स्विगी से कंपटीशन के बाद यह मेन्यू डायरेक्टरी से फूड डिलीवरी कंपनी बनी। आज यह ब्लिंकिट जैसी सेवाओं के साथ एक विशाल साम्राज्य है।
Zomato Sucess Story: आज 10 जुलाई है। और आज उस ज़ोमैटो का 18वां जन्मदिन है, जो आधी रात को भी हमारे लिए गर्मागरम खाना ले आता है। ज़ोमैटो की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लगती है, जो सुनने में काफी दिलचस्प है। यह कहानी 2008 में दिल्ली से शुरू होती है। इस कहानी के हीरो हैं IIT से पढ़े दो नौजवान - दीपिंदर गोयल और पंकज चड्ढा। दोनों दिल्ली की एक बड़ी कंसल्टिंग फर्म 'बेन एंड कंपनी' में अच्छी-खासी सैलरी पर नौकरी कर रहे थे।
दीपिंदर और पंकज ने कोई बिजनेस शुरू करने के प्लान के साथ ज़ोमैटो की शुरुआत नहीं की थी। जैसा कि उन्होंने बाद में कई बार बताया, यह आइडिया भूख से पैदा हुआ था। रोज़ दोपहर के खाने के समय ऑफिस की कैंटीन में बहुत भीड़ होती थी। रेस्टोरेंट से आए मेन्यू कार्ड को देखकर खाना ऑर्डर करने के लिए भी लोगों को लंबी लाइन लगानी पड़ती थी। एक दिन भूख से बेहाल लाइन में खड़े दीपिंदर गोयल के दिमाग में एक आइडिया आया। क्यों न इन सारे मेन्यू कार्ड्स को स्कैन करके ऑफिस की वेबसाइट पर डाल दिया जाए? इससे लोग अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही मेन्यू देखकर ऑर्डर कर सकेंगे।
उन्होंने अपने इस आइडिया पर काम किया और यह सुपर-डुपर हिट हो गया! ऑफिस के सभी लोग इस वेबसाइट का इस्तेमाल करने लगे। जब वेबसाइट पर ट्रैफिक बढ़ा, तो उन्हें समझ आया कि यह सिर्फ उनके ऑफिस की नहीं, बल्कि पूरे दिल्ली की समस्या है। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर पूरी तरह से इसी काम में लगने का फैसला किया। उन्होंने दिल्ली के रेस्टोरेंट्स के मेन्यू स्कैन करके 'Foodiebay।com' नाम से एक वेबसाइट शुरू की।
जब कंपनी धीरे-धीरे बढ़ने लगी, तो उन्होंने 'फूडीबे' नाम बदलने का फैसला किया। इसकी वजह यह थी कि यह नाम बड़ी कंपनी 'ईबे' (eBay) से मिलता-जुलता था। उन्हें एक ऐसा नाम चाहिए था जो लोगों की ज़ुबान पर आसानी से चढ़ जाए और खाने से जुड़ा हो। बहुत सोचने के बाद उन्होंने नाम रखा 'Zomato', जो 'टमाटर' (Tomato) शब्द से मिलता-जुलता है।
लेकिन शुरुआती दिनों में ज़ोमैटो फूड डिलीवरी नहीं करता था। यह सिर्फ एक 'डिजिटल डायरेक्टरी' की तरह था, जो यह बताता था कि किसी जगह पर कौन सा अच्छा खाना मिलता है, रेस्टोरेंट का माहौल कैसा है और वहां की कीमतें क्या हैं।
इस कहानी में एक बड़ा मोड़ 2015 में आया। तब तक भारत में बादशाह बनकर बैठे ज़ोमैटो के सामने 'स्विगी' (Swiggy) नाम का एक नया कॉम्पिटिटर आ गया। स्विगी ने सिर्फ मेन्यू नहीं दिखाया, बल्कि रेस्टोरेंट से खाना उठाकर लोगों के घरों तक पहुंचाना भी शुरू कर दिया! इससे ज़ोमैटो के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया। उनके सामने दो ही रास्ते थे - या तो खुद को बदलो, या फिर खत्म हो जाओ।
कंपनी के फाउंडर दीपिंदर गोयल ने पहला रास्ता चुना। ज़ोमैटो ने भी अपने डिलीवरी बॉयज़ की टीम बनाकर ऑनलाइन फूड डिलीवरी की दुनिया में कदम रखा। ज़ोमैटो ने ग्राहकों को अपनी ओर खींचने के लिए ऑफर्स और डिस्काउंट का जमकर इस्तेमाल किया। आखिरकार, ज़ोमैटो ने भारत में Uber Eats जैसी विदेशी कंपनियों को भी खरीदकर बाज़ार पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली।
एक समय था जब कंपनी के पास कर्मचारियों को सैलरी देने तक के पैसे नहीं थे, लेकिन 2021 जुलाई में उसी कंपनी ने भारतीय शेयर बाज़ार (Stock Market) में धमाकेदार एंट्री की। यह पहली बार था जब घाटे में चल रही कोई भारतीय इंटरनेट कंपनी शेयर बाज़ार में लिस्ट हो रही थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह एक चमत्कार था। भारत के लाखों आम लोगों ने ज़ोमैटो पर भरोसा करके पैसा लगाया और कंपनी रातों-रात एक बड़ी सफलता बन गई।
आज ज़ोमैटो सिर्फ एक फूड डिलीवरी कंपनी नहीं है। सिर्फ 10 मिनट में घर का सामान पहुंचाने वाला 'ब्लिंकिट' (Blinkit) आज ज़ोमैटो का हिस्सा है। रेस्टोरेंट्स को सब्जियां और ज़रूरी सामान सप्लाई करने वाला 'हाइपरप्योर' (Hyperpure) और मूवी-इवेंट टिकट बुक करने के लिए 'डिस्ट्रिक्ट' (District) जैसे बिजनेस भी ज़ोमैटो के साथ खड़े हो चुके हैं। इस बीच, को-फाउंडर पंकज चड्ढा कंपनी से अलग हो गए, लेकिन दीपिंदर गोयल अकेले ही कंपनी को आगे बढ़ाते रहे। आज दीपिंदर गोयल भारत के सबसे युवा अरबपतियों में से एक हैं।
ऑफिस कैंटीन की एक छोटी सी लाइन से शुरू हुई यह कहानी आज 1 लाख करोड़ रुपये का साम्राज्य बन चुकी है, जो लाखों युवाओं को रोजगार दे रही है और करोड़ों लोगों की भूख मिटा रही है। सही समय पर बदलाव के लिए तैयार रहना ही ज़ोमैटो की सफलता का सबसे बड़ा राज है।
