केरल लिटरेचर फेस्टिवल में प्रकाश राज ने कहा कि हिंदी सिनेमा अपनी जड़ों से कट चुका है और दिखावे पर टिका है, जबकि मलयालम और तमिल सिनेमा आज भी मजबूत, सामाजिक कहानियां कह रहा है। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में राष्ट्र भावना की कहानियां कमज़ोर पड़ने लगी हैं।

बॉक्स ऑफिस पर सनी देओल की 'बॉर्डर 2' की सक्सेस के बीच एक्टर-फिल्ममेकर प्रकाश राज ने ऐसा बयान दे दिया है, जो चर्चा में बना हुआ है। कोझिकोड में चल रहे केरल लिटरेचर फेस्टिवल (KLF) के नौवें संस्करण में प्रकाश राज ने मैनस्ट्रीम के हिंदी सिनेमा को लेकर बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि जहां मलयालम और तमिल सिनेमा आज भी कंटेंट-ड्रिवन और जमीनी कहानियों के लिए जाने जाते हैं, वहीं हिंदी फिल्म इंडस्ट्री (बॉलीवुड) अपनी जड़ों से कटती जा रही है और नकली और मनी-ड्रिवन होती जा रही है।

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हिंदी फिल्मों में आत्मा की कमी : प्रकाश राज

24 जनवरी, शनिवार को 'The Artist I Became' सेशन में बोलते हुए प्रकाश राज ने कहा कि मौजूदा दौर में हिंदी फिल्मों में सब कुछ खूबसूरत दिखता है, लेकिन उसमें गहराई और आत्मा की कमी है। उन्होंने इसकी तुलना मैडम तुसाद म्यूज़ियम से की—जहां सब कुछ चमकदार होता है, पर जीवंत नहीं। उनके मुताबिक, साउथ इंडियन सिनेमा के पास आज भी कहने के लिए सशक्त कहानियां हैं, खासकर मलयालम और तमिल सिनेमा के युवा निर्देशक दलित मुद्दों जैसे विषयों पर फिल्में बना रहे हैं, जो उम्मीद जगाती हैं।

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प्रकाश राज ने गिनाईं बॉलीवुड के पतन की वजह

पांच भाषाओं—तमिल, तेलुगु, हिंदी, कन्नड़ और मलयालम—में काम कर चुके 60 साल के एक्टर ने हिंदी सिनेमा के पतन की वजहें भी गिनाईं। उन्होंने कहा कि मल्टीप्लेक्स संस्कृति के बाद बॉलीवुड ने फिल्मों को सिर्फ शहरी दर्शकों तक सीमित कर दिया। 'क्यूट' और ग्लैमरस फिल्मों का चलन बढ़ा, जो पेज-3 संस्कृति और सतही ग्लैमर पर टिकी रहीं। इस बदलाव में इंडस्ट्री ने राजस्थान और बिहार जैसे ग्रामीण इलाकों के दर्शकों से अपना रिश्ता खो दिया।

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कमज़ोर पड़ीं राष्ट्र भावना से जुड़ीं कहानियां

प्रकाश राज का मानना है कि इस बदलाव के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण की भावना से जुड़ी कहानियां भी कमजोर पड़ गईं, जो कभी आज़ादी के बाद की हिंदी फिल्मों की पहचान थीं। अपनी बात को मजबूती देने के लिए उन्होंने 1977 की सुपरहिट फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ का उदाहरण दिया, जिसमें अलग-अलग धर्मों के तीन लोग मिलकर एक जान बचाने के लिए रक्तदान करते हैं—यह दृश्य साझा मूल्यों, सामाजिक सद्भाव और सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक था। उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि आज का हिंदी सिनेमा रील्स, दिखावे और तेज़ आत्म-प्रचार में उलझ गया है। पैसे और अपीयरेंस की दौड़ में वह दर्शकों से भावनात्मक जुड़ाव खोता जा रहा है।