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महाभारत का वो अदृश्य किरदार जिसके आज भी दीवाने हैं लोग, जानें कैसे बना 'समय' की आवाज
मुंबई। कोरोना वायरस के बीच चल रहे लॉकडाउन को फिलहाल 3 मई तक बढ़ा दिया गया है। इस दौरान दूरदर्शन पर महाभारत और रामायण जैसे सीरियल लोगों को खूब पसंद आ रहे हैं। वैसे, बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' के कई किरदारों के बारे में तो लोग काफी कुछ जानते हैं, लेकिन महाभारत के उस किरदार के बारे में लोगों को कम ही पता है, जो कभी स्क्रीन पर दिखाई ही नहीं दिया। हालांकि अपनी बुलंद आवाज के कारण आज भी लोग उस किरदार की चर्चा जरूर करते हैं। इस पैकेज में हम बता रहे हैं महाभारत के उसी किरदार के बारे में।
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80 के दशक की महाभारत में 'मैं समय हूं...' अर्थात समय को अपनी आवाज देने वाले उस शख्स का नाम है हरीश भिमानी। 15 फरवरी, 1956 को मुंबई में जन्मे हरीश भिमानी 5 भाई-बहनों में से चौथे नंबर के हैं। हरीश फिलहाल पत्नी रेखा के साथ मुंबई में ही रहते हैं। उनकी पत्नी भी वॉइस आर्टिस्ट हैं।
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हरीश भिमानी के मुताबिक, एक शाम मुझे गूफी पेंटल (शो के कास्टिंग डायरेक्टर) का फोन आया कि बीआर चोपड़ा के मेन स्टूडियो में आ जाना कुछ रिकॉर्ड करना है। इस पर मैंने पूछा क्या है तो उन्होंने बताया नहीं। दरअसल, हमारे पेशे में क्या रिकॉर्ड होने वाला है, इसे तब तक सीक्रेट रखा जाता है, जब तक कि वो लोगों के सामने नहीं आ जाए।
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हरीश के मुताबिक, मैं स्टूडियो पहुंचा तो मुझे एक कागज दिया गया। मैं अभी उसे पढ़ ही रहा था कि मुझसे कहा गया कि ये डॉक्यूमेंट्री जैसा लग रहा होगा। इस पर मैंने कहा हां ये तो बिल्कुल उसी तरह है। हालांकि मेरी रिकॉर्डिंग से वो संतुष्ट नहीं हुए।
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इसके बाद कुछ दिन बीतने के बाद फिर से मेरे पास फोन आया। मैं दोबारा गया। मैंने 6-7 टेक दिए लेकिन वो अब भी संतुष्ट नहीं हुए। फिर उन्होंने मुझे समझाया कि आपको पढ़ना नहीं, बल्कि समय को आवाज देनी है।
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इसके बाद जब फिर से रिकॉर्डिंग शुरू हुई तो मैंने एक सजेशन दिया। मैंने कहा, आप लोग चाहते हैं कि मैं अपनी आवाज बदलूं लेकिन इससे तो वो बनावटी लगेगी। उसकी गंभीरता खत्म हो जाएगी।
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फिर मैंने उनसे कहा कि क्यों न आवाज का टैम्पो बदला जाए। फिर मैंने उस स्क्रिप्ट को गंभीरता से समझाकर बोलना शुरू किया कि मैं समय हूं... इसके बाद ये टैम्पो काफी पसंद आया और इसे फाइनल कर लिया गया।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक हरीश ने 22 हजार से अधिक रिकॉर्डिंग की है। 1980 के दशक के बाद से इन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों और समारोहों की मेजबानी के अलावा कई वृत्तचित्रों, कॉर्पोरेट फिल्मों, फीचर फिल्मों, टीवी और रेडियो विज्ञापनों, खेल, संगीत एलबम में अपनी आवाज दी।
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साल 2016 में मराठी डॉक्यू-फीचर 'माला लाज वाटत नाही' जिसका हिंदी में अर्थ है 'मुझे शर्म नहीं आती' में सर्वश्रेष्ठ वॉइस ओवर के लिए हरीश को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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