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खराब क्रेडिट स्कोर की वजह से होम लोन मिलने में हो रही हो परेशानी, तो इन तरीकों से आसानी से मिलेगा कर्ज

First Published Feb 12, 2021, 7:10 AM IST
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बिजनेस डेस्क। हर आदमी का सपना होता है कि उसका अपना घर हो। आज के समय में बिना होम लोन लिए घर खरीदना मुश्किल काम है। इसके लिए लोन की जरूरत पड़ती है। आजकल ज्यादातर बैंक होम लोन (Home Loan) की सुविधा देते हैं। नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनिया (NBFC) भी होम लोन देती हैं। फिर भी सबके लिए आसानी से होम लोन ले पाना आसान नहीं होता। बैंक होम लोन देने के पहले कई बातों पर ध्यान देते हैं। अगर किसी का सिबिल स्कोर (Cibil Score) यानी क्रेडिट स्कोर खराब हो तो उसे लोन मिलने में दिक्कत होती है। वहीं, अगर किसी के पास नियमित आमदनी का सोर्स नहीं हो, तो उसे भी लोन मिलने में परेशानी होती है। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि किन उपायों से आसानी से होम लोन लिया जा सकता है। (फाइल फोटो)
 

अगर किसी का क्रेडिट स्कोर तो अच्छा हो, लेकिन रेग्युलर इनकम का सोर्स नहीं हो, तो उसे बैंक जल्दी लोन नहीं देते। ऐसे में, अगर किसी को-एप्लिकेंट को जोड़ा जाए, जिसके पास स्थाई और नियमित आमदनी का स्रोत हो, तब लोन अप्रूव होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए को-एप्लिकेंट को जोड़ने पर ध्यान देना चाहिए। (फाइल फोटो)

अगर किसी का क्रेडिट स्कोर तो अच्छा हो, लेकिन रेग्युलर इनकम का सोर्स नहीं हो, तो उसे बैंक जल्दी लोन नहीं देते। ऐसे में, अगर किसी को-एप्लिकेंट को जोड़ा जाए, जिसके पास स्थाई और नियमित आमदनी का स्रोत हो, तब लोन अप्रूव होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए को-एप्लिकेंट को जोड़ने पर ध्यान देना चाहिए। (फाइल फोटो)

कम रकम के लोन के लिए अप्लाई करने पर भी लोन अप्रूव होने की संभावना ज्यादा रहती है। लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो कम रहने का मतलब है कि लोन के लिए अप्लाई करने वाला घर खरीदने या बनाने के लिए अपने पास से ज्यादा रकम खर्च करेगा। इससे बैंक का जोखिम कम होता है, वहीं लोन की ईएमआई भी कम हो जाती है। इसे चुका पाना आसान होता है। इसलिए ऐसे एप्लिकेशन पर बैंक लोन अप्रूव कर देते हैं। (फाइल फोटो)

कम रकम के लोन के लिए अप्लाई करने पर भी लोन अप्रूव होने की संभावना ज्यादा रहती है। लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेश्यो कम रहने का मतलब है कि लोन के लिए अप्लाई करने वाला घर खरीदने या बनाने के लिए अपने पास से ज्यादा रकम खर्च करेगा। इससे बैंक का जोखिम कम होता है, वहीं लोन की ईएमआई भी कम हो जाती है। इसे चुका पाना आसान होता है। इसलिए ऐसे एप्लिकेशन पर बैंक लोन अप्रूव कर देते हैं। (फाइल फोटो)

अगर होम लोन मिलने में परेशानी हो रही हो, तो सिक्योर्ड लोन लेने की संभावना तलाशनी चाहिए। जो लोन किसी एसेट की गांरटी पर लिया जाता है, उसे सिक्योर्ड लोन कहते हैं। प्रॉपर्टी, गोल्ड, फिक्स्ड डिपॉजिट, शेयर, म्यूचुअल फंड या पीपीएफ पर सिक्योर्ड लोन लिया जा सकता है। यह लोन आसानी से मिल जाता है। (फाइल फोटो)

अगर होम लोन मिलने में परेशानी हो रही हो, तो सिक्योर्ड लोन लेने की संभावना तलाशनी चाहिए। जो लोन किसी एसेट की गांरटी पर लिया जाता है, उसे सिक्योर्ड लोन कहते हैं। प्रॉपर्टी, गोल्ड, फिक्स्ड डिपॉजिट, शेयर, म्यूचुअल फंड या पीपीएफ पर सिक्योर्ड लोन लिया जा सकता है। यह लोन आसानी से मिल जाता है। (फाइल फोटो)

अगर आमदनी कम हो या रेग्युलर इनकम का सोर्स नहीं हो, तब उस बैंक में होम लोन के लिए अप्लाई करना चाहिए, जहां सेविंग्स या फिक्स्ड अकाउंट हो। क्रेडिट स्कोर ठीक रहने पर ऐसे बैंक से होम लोन मिलने की संभावना ज्यादा रहती है। (फाइल फोटो)

अगर आमदनी कम हो या रेग्युलर इनकम का सोर्स नहीं हो, तब उस बैंक में होम लोन के लिए अप्लाई करना चाहिए, जहां सेविंग्स या फिक्स्ड अकाउंट हो। क्रेडिट स्कोर ठीक रहने पर ऐसे बैंक से होम लोन मिलने की संभावना ज्यादा रहती है। (फाइल फोटो)

अगर बैंक से होम लोन मिलने में परेशानी हो रही हो, तो नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFC) से लोन लेने की कोशिश करनी चाहिए। इन कंपनियों से बैंकों की तुलना में लोन आसानी से मिल जाता है। यह अलग बात है कि नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां लोन पर ज्यादा ब्याज लेती हैं। (फाइल फोटो)

अगर बैंक से होम लोन मिलने में परेशानी हो रही हो, तो नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFC) से लोन लेने की कोशिश करनी चाहिए। इन कंपनियों से बैंकों की तुलना में लोन आसानी से मिल जाता है। यह अलग बात है कि नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां लोन पर ज्यादा ब्याज लेती हैं। (फाइल फोटो)

लोन के लिए अप्लाई करने पर बैंक फिक्स ऑब्लिगेशन टू इनकम रेश्यो (FOIR) को भी देखते हैं। इससे उन्हें इस बात का अंदाज मिल जाता है कि लोन लेने वाला हर महीने लोन की कितने की किस्त चुका सकता है। इससे पहले से जा रही ईएमआई, होम रेंट, बीमा पॉलिसी पर खर्च और दूसरे खर्चों का पता चल जाता है। अगर बैंक को यह लगता है कि ये सारा खर्च किसी की सैलरी का 50 फीसदी है, तो वे लोन एप्लिकेशन रिजेक्ट कर देते हैं। वहीं, कम रकम के लोन को मंजूरी मिलने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती है। (फाइल फोटो)

लोन के लिए अप्लाई करने पर बैंक फिक्स ऑब्लिगेशन टू इनकम रेश्यो (FOIR) को भी देखते हैं। इससे उन्हें इस बात का अंदाज मिल जाता है कि लोन लेने वाला हर महीने लोन की कितने की किस्त चुका सकता है। इससे पहले से जा रही ईएमआई, होम रेंट, बीमा पॉलिसी पर खर्च और दूसरे खर्चों का पता चल जाता है। अगर बैंक को यह लगता है कि ये सारा खर्च किसी की सैलरी का 50 फीसदी है, तो वे लोन एप्लिकेशन रिजेक्ट कर देते हैं। वहीं, कम रकम के लोन को मंजूरी मिलने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती है। (फाइल फोटो)

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