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चौथी में 4 सब्जेक्ट में फेल, स्कूल ने किया पढ़ाने से इंकार, जिद थी अफसर बनना है...और बन गए IAS

First Published Feb 4, 2020, 12:00 PM IST
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दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं  होती है। आज हम आपको बेहद संघर्षों में आगे बढ़े 2010 बैच के IAS महेंद्र बहादुर सिंह की कहानी बताने जा रहे हैं। महेंद्र यूपी के फतेहपुर के रहने वाले हैं। उनकी शुरुआती लाइफ बेहद संघर्षों से भरी रही है। वर्तमान में महेंद्र बहादुर सिंह मैनपुरी के डीएम हैं।

दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं  होती है। आज हम आपको बेहद संघर्षों में आगे बढ़े 2010 बैच के IAS महेंद्र बहादुर सिंह की कहानी बताने जा रहे हैं। महेंद्र यूपी के फतेहपुर के रहने वाले हैं। उनकी शुरुआती लाइफ बेहद संघर्षों से भरी रही है। महेंद्र बहादुर सिंह 2010 बैच के IAS अफसर हैं। वर्तमान में महेंद्र बहादुर सिंह मैनपुरी के डीएम हैं। इसके पूर्व वह बांदा, व रामपुर में डीएम का पद संभाल चुके हैं। डीएम रहने के दौरान जनसुनवाई और उसके निस्तारण में उनका काम इतना बेहतरीन रहा कि उन्हें यूपी सरकार ने सम्मानित किया था । मैनपुरी डीएम बनाए जाने के पूर्व वह गन्ना विकास विभाग में अपर आयुक्त के पद पर तैनात थे।

दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं होती है। आज हम आपको बेहद संघर्षों में आगे बढ़े 2010 बैच के IAS महेंद्र बहादुर सिंह की कहानी बताने जा रहे हैं। महेंद्र यूपी के फतेहपुर के रहने वाले हैं। उनकी शुरुआती लाइफ बेहद संघर्षों से भरी रही है। महेंद्र बहादुर सिंह 2010 बैच के IAS अफसर हैं। वर्तमान में महेंद्र बहादुर सिंह मैनपुरी के डीएम हैं। इसके पूर्व वह बांदा, व रामपुर में डीएम का पद संभाल चुके हैं। डीएम रहने के दौरान जनसुनवाई और उसके निस्तारण में उनका काम इतना बेहतरीन रहा कि उन्हें यूपी सरकार ने सम्मानित किया था । मैनपुरी डीएम बनाए जाने के पूर्व वह गन्ना विकास विभाग में अपर आयुक्त के पद पर तैनात थे।

IAS महेंद्र बहादुर सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के पास ही एक स्कूल में हुई। महेंद्र बताते हैं कि एक दिन उनके पिता को स्कूल के टीचर ने बुलाया। पिता जी ने सोचा कि मैंने कोई शरारत की होगी। जब वह स्कूल में पहुंचे तो प्रिंसिपल ने उनसे कहा कि आपका बेटा पढ़ने में काफी होशियार है। गांव के स्कूल में उसकी बेहतर शिक्षा सम्भव नहीं है। इसलिए इसे आप शहर के किसी अच्छे स्कूल में ले जाइए।

IAS महेंद्र बहादुर सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के पास ही एक स्कूल में हुई। महेंद्र बताते हैं कि एक दिन उनके पिता को स्कूल के टीचर ने बुलाया। पिता जी ने सोचा कि मैंने कोई शरारत की होगी। जब वह स्कूल में पहुंचे तो प्रिंसिपल ने उनसे कहा कि आपका बेटा पढ़ने में काफी होशियार है। गांव के स्कूल में उसकी बेहतर शिक्षा सम्भव नहीं है। इसलिए इसे आप शहर के किसी अच्छे स्कूल में ले जाइए।

महेंद्र बताते हैं कि मेरे पिता चकबंदी विभाग में क्लर्क थे। सही मायने में मेरी सफलता के पीछे उन्ही का हांथ है। स्कूल टीचर के कहने के बाद वह मुझे लेकर घर छोड़कर फतेहपुर शहर में किराए का मकान लेकर रहने लगे। वहां शहर के एक अच्छे स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया गया। उन्होंने मिड टर्म में ही एडमिशन फतेहपुर के एक प्राइवेट स्कूल में करवाया। मेरा एडमिशन तो हो गया, लेकिन दो महीने बाद हुए हाफ ईयरली एग्जाम में मेरा रिजल्ट बेहद खराब रहा। मैं 6 में से 4 सब्जेक्ट्स में फेल हो गया। मैं घर आकर बहुत रोया तब पापा ने मुझे समझाया कि तुम मेहनत करो, सब अच्छा होगा। उसी साल फाइनल एग्जाम में क्लास में सेकंड पोजिशन हासिल की। उसके बाद हर एग्जाम में टॉपर बनने लगे।

महेंद्र बताते हैं कि मेरे पिता चकबंदी विभाग में क्लर्क थे। सही मायने में मेरी सफलता के पीछे उन्ही का हांथ है। स्कूल टीचर के कहने के बाद वह मुझे लेकर घर छोड़कर फतेहपुर शहर में किराए का मकान लेकर रहने लगे। वहां शहर के एक अच्छे स्कूल में मेरा दाखिला करवा दिया गया। उन्होंने मिड टर्म में ही एडमिशन फतेहपुर के एक प्राइवेट स्कूल में करवाया। मेरा एडमिशन तो हो गया, लेकिन दो महीने बाद हुए हाफ ईयरली एग्जाम में मेरा रिजल्ट बेहद खराब रहा। मैं 6 में से 4 सब्जेक्ट्स में फेल हो गया। मैं घर आकर बहुत रोया तब पापा ने मुझे समझाया कि तुम मेहनत करो, सब अच्छा होगा। उसी साल फाइनल एग्जाम में क्लास में सेकंड पोजिशन हासिल की। उसके बाद हर एग्जाम में टॉपर बनने लगे।

महेंद्र बताते हैं, पिताजी सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले मेरा खाना बना लेते थे। वो ही मुझे तैयार करके स्कूल भेजते थे। मां तीन भाइयों के साथ गांव में थीं। यही नहीं, जूनियर क्लासेस तक तो वो मेरे नोट्स भी तैयार करवाते थे। पिताजी लगातार मेरे लिए मेहनत करते रहे। वो खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने और साफ-सफाई का काम तक खुद ही करते थे। मुझे पढ़ाई में डिस्टर्ब न हो, इसके लिए उन्होंने कभी मुझसे कभी काम में हाथ बंटाने के लिए नहीं कहा।

महेंद्र बताते हैं, पिताजी सुबह ड्यूटी पर जाने से पहले मेरा खाना बना लेते थे। वो ही मुझे तैयार करके स्कूल भेजते थे। मां तीन भाइयों के साथ गांव में थीं। यही नहीं, जूनियर क्लासेस तक तो वो मेरे नोट्स भी तैयार करवाते थे। पिताजी लगातार मेरे लिए मेहनत करते रहे। वो खाना बनाने से लेकर कपड़े धोने और साफ-सफाई का काम तक खुद ही करते थे। मुझे पढ़ाई में डिस्टर्ब न हो, इसके लिए उन्होंने कभी मुझसे कभी काम में हाथ बंटाने के लिए नहीं कहा।

महेंद्र ने बताया कि, 12वीं के बाद मैंने आईआईटी एंट्रेंस एग्जाम दिया था, लेकिन उसमें पास नहीं हुआ । मेरा सिलेक्शन यूपीटीयू में हुआ था, जहां से मैंने बीटेक की डिग्री हासिल की। मैं इंजीनियरिंग खत्म होते ही सिविल सर्विसेज की तैयारी में लग गया था। इस दौरान मेरी कई कंपनियों में जॉब भी लगी, लेकिन मेरा फोकस IAS ही था। मैंने 2010 में यूपीएससी एग्जाम दिया और तीसरे अटैम्प्ट में क्लीयर हो गया। पिता जी का सपना भी था, जो कि पूरा हुआ।

महेंद्र ने बताया कि, 12वीं के बाद मैंने आईआईटी एंट्रेंस एग्जाम दिया था, लेकिन उसमें पास नहीं हुआ । मेरा सिलेक्शन यूपीटीयू में हुआ था, जहां से मैंने बीटेक की डिग्री हासिल की। मैं इंजीनियरिंग खत्म होते ही सिविल सर्विसेज की तैयारी में लग गया था। इस दौरान मेरी कई कंपनियों में जॉब भी लगी, लेकिन मेरा फोकस IAS ही था। मैंने 2010 में यूपीएससी एग्जाम दिया और तीसरे अटैम्प्ट में क्लीयर हो गया। पिता जी का सपना भी था, जो कि पूरा हुआ।

IAS महेंद्र बहादुर सिंह प्राइमरी एजूकेशन पर काफी ध्यान देते हैं। वह अक्सर अपनी पत्नी अल्पना व बेटियों ट्विंकल और आशिमा के साथ किसी प्राथमिक विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई की जांच के लिए निकल जाते हैं। यही नहीं वह उसी स्कूल में मिड डे मील में बने भोजन को भी खाते हैं। महेंद्र बहादुर सिंह कार्यशैली से लोग काफी प्रभावित रहते हैं।

IAS महेंद्र बहादुर सिंह प्राइमरी एजूकेशन पर काफी ध्यान देते हैं। वह अक्सर अपनी पत्नी अल्पना व बेटियों ट्विंकल और आशिमा के साथ किसी प्राथमिक विद्यालय में बच्चों की पढ़ाई की जांच के लिए निकल जाते हैं। यही नहीं वह उसी स्कूल में मिड डे मील में बने भोजन को भी खाते हैं। महेंद्र बहादुर सिंह कार्यशैली से लोग काफी प्रभावित रहते हैं।

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