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सड़क पर बैठ बेबसी के आंसू बहा रहे बुजुर्ग मां-बाप, कहने को हैं 6 बच्चे

First Published Sep 19, 2019, 6:47 PM IST
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किसी मां-बाप के लिए बुढ़ापे में इससे बड़ा संकट और क्या होगा कि उन्हें भरे-पूरे परिवार के बावजूद दर-दर की ठोंकरे खानी पड़ रही हों। जिनके लिए दवाइयों और छत की छोड़िए, खाने तक के लाले पड़े हों। यह बुजुर्ग दम्पती कलेक्टर से सिर्फ इतना मांगने आया था कि उन्हें रहने के लिए सरकारी छत मुहैया करा दो।

बिलासपुर. जिन मां-बाप ने अपने 6 बच्चों को पाल-पोसकर पैरों पर खड़ा किया, वे इतनी निष्ठुर निकलेंगे, इन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। बीमारी से लाचार यह बुजुर्ग दम्पती कलेक्टर के पास मदद की गुहार लगाने आया था। लेकिन यहां भी नीयती देखिए, कलेक्टर डॉ. संजय अलंग पेंड्रा के दौरे पर थे, लिहाजा उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। यहां सड़क पर बेजान से पड़ा दम्पती ने अपनी व्यथा सुनाते हुए फूट-फूटकर रो पड़ा। बीमारी और उस पर भी इलाज न होने से हड्डियों का ढांचा बन चुके ये हैं साहिब सिंह और उनकी पत्नी माना बाई। ये जबड़ापारा में किराए में मकान में रहते थे। लेकिन अब किराया चुकाने के पैसे नहीं हैं। इसलिए मकान छोड़ना पड़ा। अब वे कहां जाएंगे? यह सोच-सोचकर उनके आंसू निकल पड़े। यह दम्पती प्रधानमंत्री आवास का आवेदन लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे थे।

बिलासपुर. जिन मां-बाप ने अपने 6 बच्चों को पाल-पोसकर पैरों पर खड़ा किया, वे इतनी निष्ठुर निकलेंगे, इन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। बीमारी से लाचार यह बुजुर्ग दम्पती कलेक्टर के पास मदद की गुहार लगाने आया था। लेकिन यहां भी नीयती देखिए, कलेक्टर डॉ. संजय अलंग पेंड्रा के दौरे पर थे, लिहाजा उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। यहां सड़क पर बेजान से पड़ा दम्पती ने अपनी व्यथा सुनाते हुए फूट-फूटकर रो पड़ा। बीमारी और उस पर भी इलाज न होने से हड्डियों का ढांचा बन चुके ये हैं साहिब सिंह और उनकी पत्नी माना बाई। ये जबड़ापारा में किराए में मकान में रहते थे। लेकिन अब किराया चुकाने के पैसे नहीं हैं। इसलिए मकान छोड़ना पड़ा। अब वे कहां जाएंगे? यह सोच-सोचकर उनके आंसू निकल पड़े। यह दम्पती प्रधानमंत्री आवास का आवेदन लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे थे।

साहिब सिंह को बीमारी ने इतना लाचार कर दिया है कि वे ठीक से खड़े तक नहीं हो सकते। हालांकि उनकी आंखें बयां कर रही थीं कि अगर उनका शरीर जवाब नहीं देता, तो शायद वे किसी को आगे हाथ तक नहीं फैलाते। माना बाई रुंधे गले से बताती हैं कि वे कभी सम्पन्न थे। मोहतरा में रहते थे। शादी के बाद तखतपुर ब्लॉक के गांव देवतरी आ गए। इनकी 4 लड़कियां और 2 लड़के हैं। सबकी शादी हो चुकी हैं। वे सभी सम्पन्न हैं।

साहिब सिंह को बीमारी ने इतना लाचार कर दिया है कि वे ठीक से खड़े तक नहीं हो सकते। हालांकि उनकी आंखें बयां कर रही थीं कि अगर उनका शरीर जवाब नहीं देता, तो शायद वे किसी को आगे हाथ तक नहीं फैलाते। माना बाई रुंधे गले से बताती हैं कि वे कभी सम्पन्न थे। मोहतरा में रहते थे। शादी के बाद तखतपुर ब्लॉक के गांव देवतरी आ गए। इनकी 4 लड़कियां और 2 लड़के हैं। सबकी शादी हो चुकी हैं। वे सभी सम्पन्न हैं।

साहिब सिंह की उम्र 74 साल हो चुकी है। वे काफी देर तक कलेक्टर का इंतजार करते रहे। जब मालूम चला कि कलेक्टर साब तो टूर पर हैं, तो यह सुनकर आंखों में आंसू भर आए।

साहिब सिंह की उम्र 74 साल हो चुकी है। वे काफी देर तक कलेक्टर का इंतजार करते रहे। जब मालूम चला कि कलेक्टर साब तो टूर पर हैं, तो यह सुनकर आंखों में आंसू भर आए।

माना बाई ने बताया कि 5 साल पहले उनके बच्चों ने घर से निकाल दिया। उसके बाद वे किराए के मकान में रह रहे थे। लेकिन कामकाज के अभाव में सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई। अब किराया छोड़िए खाने-पीने तक के लाले पड़े हुए हैं।

माना बाई ने बताया कि 5 साल पहले उनके बच्चों ने घर से निकाल दिया। उसके बाद वे किराए के मकान में रह रहे थे। लेकिन कामकाज के अभाव में सारी जमा-पूंजी खर्च हो गई। अब किराया छोड़िए खाने-पीने तक के लाले पड़े हुए हैं।

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