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बताया जाता है की इस घटना में करीब 5.21 लाख लोग इससे प्रभावित हुए। उन 3 दिनों में भोपाल और उसके आसपास के इलाके ने इस भयानक मंजर को देखा था। 3 हजार से ज्यादा लोगों की मौत शुरुआती दिनों के अंदर हुई। पूरे गैस कांड में करीब 23 हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई।

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2 दिसंबर की रात से 3 दिसंबर की उस मनहूस सुबह तक यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर 'सी' में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे। लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर एकाएक क्या हो रहा है? कुछ लोगों का कहना है कि गैस के कारण लोगों की आंखों और सांस लेने में परेशानी हो रही थी। जिन लोगों के फैंफड़ों में बहुत गैस पहुंच गई थी उनकी तुंरत ही मौत हो गई थी। 

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार लोग मारे गए थे। हालांकि गैर सरकारी स्रोत मानते हैं कि ये संख्या करीब तीन गुना ज्यादा थी। इतना ही नहीं, कुछ लोगों का दावा है कि मरने वालों की संख्या 15 हजार से भी अधिक रही होगी। पर मौतों का ये सिलसिला उस रात जब शुरू हुआ तो वह बरसों तक चलता रहा। उस घटना में संक्रमित लोग इलाज के दौरान मरते रहे, कुछ की मौत तो 6 माह जबकि कुछ की साल भर बाद भी हुई। 

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इस गैस रिसाव के सबसे ज्यादा शिकार कारखाने के पास बनी झुग्गी बस्ती के लोग थे। ये वे लोग थे जो कि रोजीरोटी की तलाश में दूर-दूर के गांवों से आकर यहां पर रह रहे थे। उन्होंने नींद में ही अपनी आखिरी सांस ली। गैस को लोगों को मारने के लिए मात्र तीन मिनट ही काफी थे। 

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जब बड़ी संख्या में लोग गैस की चपेट में आकर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों को भी पता नहीं था कि इस आपदा का कैसे इलाज किया जाए? मरीजों की संख्या भी इतनी अधिक थी कि लोगों को भर्ती करने की जगह नहीं रही। बहुतों को दिख नहीं रहा था तो बड़ी संख्या में लोगों का सिर चकरा रहा था। 

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शुरू में डॉक्टरों को ही ठीक तरह से पता नहीं था कि क्या इलाज किया जाए। शहर में ऐसे डॉक्टर भी नहीं थे, जिन्हें इस तरह की जहरीली गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव रहा हो। ये कहना गलत नहीं होगा कि वर्ष 1984 में हुई इस हादसे से आज तक भोपाल उबर नहीं पाया है।