2010 से 2019; दशक के वे 10 नेता जिन्होंने देश की राजनीति पर छोड़ दी नई छाप
नई दिल्ली. भारत पिछले दस साल में एक बड़े राजनीतिक बदलाव का साक्षी रहा है। कई राजनेता, जो पहले क्षेत्रीय खिलाड़ी थे, ने राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया और जल्द ही शिखर पर पहुंच गए। वहीं, दूसरी तरफ इस दशक में कुछ पारंपरिक दिग्गजों का प्रभाव इस कदर कम हुआ है कि वे सिर्फ छोटी पार्टियों तक सीमित रह गए हैं। इस दशक के अंतिम साल यानी 2019 में लोकसभा चुनाव हुआ, जहां विपक्ष एकजुट होने में विफल रहा और ना केवल भाजपा ने दोबारा चुनाव जीता, बल्कि 2014 से ज्यादा प्रचंड बहुमत हासिल किया। इस दौरान कई उतार चढ़ाव भी देखने को मिले। इसके बावजूद कई ऐसे नेता राष्ट्रीय पटल पर सामने आए, जिन्होंने पिछले एक दशक की राजनीति को प्रभावित किया। हम ऐसे ही 10 नेताओं के बारे में आपको बता रहे हैं...
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1- स्मृति ईरानी: डेली सॉप अभिनेत्री से फुल टाइम राजनीतिक बनी स्मृति ईरानी ने इस दशक में भारत की राजनीति पर अहम छाप छोड़ी। वे मोदी सरकार में अहम सदस्य हैं। इस दशक के शुरुआत में वे भाजपा की महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वे गुजरात से राज्यसभा पहुंचीं। 2013 में जब राजनाथ सिंह भाजपा अध्यक्ष बने, तो उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। 2014 लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमेठी से राहुल गांधी को कड़ी चुनौती दी। उन्होंने राहुल के जीत के मार्जिन को 1 लाख तक ला दिया। स्मृति ने अगले पांच साल तक अमेठी में जमकर प्रचार किया। 2019 में उन्होंने राहुल को गांधी परिवार की परंपरागत सीट से मात दे दी। मोदी सरकार में उन्हें महिला विकास मंत्रालय दिया गया।
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2- हेमंत विश्वा शर्मा: 2014 में हेमंत विश्वा शर्मा कांग्रेस पार्टी के नेता थे। वे नॉर्थ ईस्ट के बड़े चेहरे थे, उस वक्त कांग्रेस के पास सात राज्यों में से पांच में सत्ता थी। वहीं, भाजपा के पास नॉर्थ ईस्ट का एक भी राज्य नहीं था। एक साल बाद हेमंत ने कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के अध्यक्ष के रूप में पदभार संभाला और क्षेत्र में राज्यों के लिए पार्टी की रणनीति तैयार की। 2018 दिसंबर तक उन्होंने सातों राज्यों में पार्टी की पकड़ मजबूत करने में काफी अहम रोल निभाया। 2019 में उन्हें भाजपा ने लोकसभा का टिकट नहीं दिया, पार्टी चाहती थी कि वे सातों राज्यों में प्रचार करें। भाजपा ने 7 राज्यों में 25 सीटें जीतीं, यहां भाजपा को 2014 में सिर्फ 8 सीटें मिली थीं।
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3- अरविंद केजरीवाल : एक पूर्व टैक्स अफसर से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल का राजनीति में उदय किसी चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने 2011 में अन्ना हजारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन का पूरा फायदा उठाया। इसी के चलते दोनों के रिश्तों में खटास आ गई और नवंबर 2012 में, केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक पार्टी, आम आदमी पार्टी बनाई। दिसंबर 2013 में उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, उन्होंने 49 दिन बाद ही इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने बनारस से पीएम मोदी के खिलाफ 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ा। इसमें उन्हें बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। इस दौरान उनकी काफी आलोचना भी हुई। इसी साल उन्होंने दिल्ली में एक बार फिर प्रचार किया। विधानसभा चुनाव में उन्हें प्रचंड बहुमत मिला, 70 सीटों वाले राज्य में भाजपा सिर्फ 3 पर सिमट गई। हालांकि, दिल्ली के बाहर उनकी पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई।
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4- जगन मोहन रेड्डी: 2010 में कांग्रेस सांसद से लेकर 2019 में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री तक जगन मोहन रेड्डी ने पिछले एक दशक में अपनी राजनीतिक यात्रा की। पिता और आंध्रप्रदेश के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की 2009 में मौत के बाद जगन मोहन रेड्डी को समर्थक विरासत में मिले। वे पिता की मौत के बाद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने इसकी इजाजत नहीं दी। 2010 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और नई पार्टी वाईएसआर बनाई। पांच साल बाद उन्होंने सत्ताधारी पार्टी तेदेपा को सत्ता से बेदखल कर दिया। उनकी पार्टी ने 175 सीटों वाले राज्य आंध्र में विधानसभा चुनाव में 151 सीटों पर जीत हासिल की। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 25 में से 22 पर जीत मिली।
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5- निर्मला सीतारमण: भाजपा में शामिल होने के चार साल बाद 2010 में उन्हें भाजपा का प्रवक्ता बनाया गया। पिछले एक दशक में उन्होंने देश की राजनीति में अपनी अलग छाप छोड़ी। दिवंगत अरुण जेटली की जगह सीतारमण वित्त मंत्रालय संभाल रही हैं। 2014 में उन्हें केंद्रीय राज्य मंत्री का पद दिया गया था। उन्हें वाणिज्य राज्य मंत्री का पद दिया गया था। 2017 में वे देश की पहली पूर्णकालिक रक्षा मंत्री बनीं। इस दौरान उन्होंने राफेल पर सरकार का पक्ष रखा। उनके रक्षा मंत्री रहते ही एयरफोर्स ने पाकिस्तान के बालाकोट में एयरस्ट्राइक की। जब भाजपा 2019 में दोबारा सत्ता में आई तो उन्हें पहली पूर्ण कालिक महिला वित्त मंत्री बनया गया।
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6- ममता बनर्जी: 2011 में ममता बनर्जी के तूफान ने वामपंथी गढ़ पश्चिम बंगाल में 34 साल लंबे कम्युनिस्ट शासन को उखाड़ फेंका। 2 साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में एनडीए और यूपीए के बीच हुए कड़े मुकाबले में भी अपनी पहचान छोड़ दी। तृणमूल कांग्रेस ने 42 सीटों वाले राज्य में 34 पर जीत हासिल की। 2016 में वे दोबारा मुख्यमंत्री बनीं। ममता केंद्र की मोदी सरकार की प्रखर विरोधी हैं। हर मुद्दे पर वे अपनी बात स्पष्टता से रखती हैं। हालांकि, 2019 लोकसभा चुनाव में वे मोदी लहर को नहीं रोक सकीं। भाजपा ने बंगाल में सेंध लगाते हुए राज्य में 18 सीटों पर जीत हासिल की। इसके बावजूद CBI, CAA, NRC को लेकर ममता लगातार भाजपा सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर आई हैं।
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7 अरुण जेटली: सरकार की उपलब्धि बतानी हो या विवादित नीतियों पर बचानव करना हों, भाजपा के दिवंगत नेता और पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली पर पीएम मोदी ने हमेशा भरोसा किया। जेटली 1990 के दशक से ही दिल्ली में नरेंद्र मोदी के भरोसेमंद रहे। वे पीएम मोदी की सरकार में नंबर 2 बन गए और उनके सबसे विश्वसनीय मंत्रियों में से एक रहे। वित्त मंत्री के रूप में, वे जीएसटी लाए और यहां तक कि सरकार के विवादास्पद कदमों जैसे नोट बंदी का भी उन्होंने खूब बचाव किया। मई 2019 में दोबारा सरकार बनने के बाद उन्होंने बीमारी के चलते खुद मंत्री पद लेने से इनकार कर दिया। जेटली का 26 अगस्त को निधन हो गया।
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8- केसीआर: तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव को केसीआर नाम से भी जाना जाता है। वे बड़े क्षेत्रीय नेता हैं। उन्होंने विधानसभा चुनाव में विपक्षी पार्टियों को ढेर कर दिया। 10 साल पहले तेलंगाना को अलग राज्य बनाने वाले नेताओं में प्रमुख चेहरा थे। उन्होंने अलग राज्य बनाने के उद्देश्य से ही पार्टी का गठन किया था। 2014 में तेलंगाना अलग राज्य बना। राव सीएम बने, वे 1983 से कभी चुनाव नहीं हारे। 2014 में तेलंगाना में टीआरएस ने 17 में से 11 सीटों पर जीत हासिल की। इस दौरान उनकी पार्टी ने 119 सीटों वाले राज्य में 63 पर जीत हासिल की। 2018 में उन्होंने समय से पहले ही विधानसभा भंग करा दी। इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल किया। लोकसभा चुनाव में टीआरएस ने 9 सीटों पर जीत हासिल की। केसीआर लोकसभा चुनाव में बिना कांग्रेस और बिना भाजपा के फ्रंट बनाने के पक्ष में थे।
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9- नरेंद्र मोदी: 2014 तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। यहां उन्होंने एक दशक से ज्यादा वक्त इस पद पर निभाया था। 2002 में गुजरात दंगों में उनपर गंभीर आरोप भी लगे थे। लेकिन 2014 में 16वीं लोकसभा चुनाव के बाद यह सब बदल गया। लोकसभा चुनाव के साथ ही वे भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बन गए। नरेंद्र मोदी ने इतिहास रचा, उनके नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई। 2019 में भाजपा ने एक बार फिर नया रिकॉर्ड बनाया। जहां विपक्षी दल एक एक सीट पर संघर्ष करते दिखे, वहीं, मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा ने 303 सीटों पर जीत हासिल की। पीएम मोदी ने पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाई है और उनकी प्रमुखता अगले दशक तक जारी रहने की उम्मीद है।
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10- अमित शाह: लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले अमित शाह ने एक लंबा रास्ता तय किया है। इस दशक की शुरुआत में वे गुजरात के गृह मंत्री थे। वह दशकों से नरेंद्र मोदी के सबसे भरोसेमंद रहे हैं। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें पहली बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया। 2019 में वे नई भूमिका में दिखे। पिछले कुछ महीनों में वे मोदी के बाद नंबर 2 भूमिका में नजर आए हैं। जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 वापस लेना हो या फिर नागरिकता कानून। हर मुद्दे पर अमित शाह ने सरकार की कमान संभाली है। अमित शाह को उनके आक्रामक तेवरों के चलते भी जाना जाता है।
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