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Kargil Vijay Diwas: कौन हैं कैप्टन विक्रम बत्रा जिन्होंने पाकिस्तान को चटाई धूल, जानें कैसे बने करगिल के हीरो
Kargil Vijay Diwas: करगिल युद्ध को हुए 23 साल हो गए हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच हुई इस जंग में हमारे कई सैनिकों ने अपना बलिदान दिया। इन्हीं में से एक नाम है कैप्टन विक्रम बत्रा का। करगिल वॉर (Kargil War) के हीरो रहे कैप्टन विक्रम बत्रा (Vikram Batra) ने 5 सबसे महत्वूपर्ण प्वाइंट जीतने में अहम भूमिका निभाई थी। यहां तक कि एक जख्मी अफसर को बचाते-बचाते वो देश पर बलिदान हो गए।

कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर, 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। पिता से देश प्रेम की कहानियां सुनकर विक्रम बत्रा में स्कूल के समय से ही देश भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। विक्रम बत्रा स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद चंडीगढ़ चले गए और डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ से साइंस में ग्रैजुएशन पूरा किया। इस दौरान वो NCC के सर्वश्रेष्ठ कैडेट भी चुने गए। इसके बाद उन्होंने आर्मी ज्वाइन करने का मन बना लिया था।
साइंस ग्रैजुएट होने की वजह से विक्रम बत्रा का सिलेक्शन सीडीएस के जरिए आर्मी में हो गया। जुलाई, 1996 में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में एडमिशन लिया। इसके बाद, दिसंबर 1997 में ट्रेनिंग खत्म होने पर उन्हें जम्मू के सोपोर में सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर ज्वाइनिंग मिल गई।
विक्रम बत्रा को जून, 1999 में कारगिल युद्ध में भेजा गया। हम्प और रॉकी नाब को जीतने के बाद विक्रम बत्रा को लेफ्टिनेंट से कैप्टन बना दिया गया। इसके बाद कश्मीर की 5140 नंबर की चोटी को पाकिस्तानी सेना के कब्जे से छुड़ाने की जिम्मेदारी कैप्टन बत्रा को सौंपी गई।
कैप्टन विक्रम बत्रा ने 19 जून, 1999 को रात में इस चोटी को जीतने का प्लान बनाया। इसके लिए भारतीय तोपों की फायरिंग के बीच आधी रात में ही चढ़ाई शुरू कर दी गई। चोटी के करीब पहुंच कर तोपों से फायरिंग बंद कर दी गई। ये देख बंकरों में छुपे पाकिस्तानी सैनिक बाहर आए। इस पर भारतीय जवानों ने मशीनगनों से फायरिंग शुरु कर दी।
इसके बाद बत्रा ने आर्टिलरी से कॉन्टैक्ट किया और दुश्मनों पर तोप से गोले दागते रहने को कहा। लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा ने अकेले ही नजदीकी लड़ाई में तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। 20 जून 1999 को सुबह साढ़े 3 बजे कैप्टन विक्रम बत्रा ने पाकिस्तानी सैनिकों को धूल चटाते हुए 5140 चोटी पर तिरंगा फहरा दिया।
प्वांइट 5140 को जीतने के बाद विकम बत्रा ने प्वाइंट 4700, जंक्शन पीक और थ्री पिंपल कॉम्प्लेक्स को भी जीत लिया। इस ऑपरेशन में किसी भारतीय सैनिक की जान नहीं गई। इसके बाद लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को प्रमोट कर कैप्टन बना दिया गया।
चार चोटियों को जीतने के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को अगले प्वांइट 4875 को जीतने की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह समुद्र सतह से 17 हजार फीट की ऊंचाई पर थी। 4 जुलाई 1999 की शाम 6 बजे उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ प्वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्मन पर हमला शुरू किया। रात भर बिना रुके गोलीबारी चलती रही, लेकिन यह चोटी अब तक फतेह नहीं हो पाई।
कैप्टन बत्रा और उनकी टीम प्वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्मन के बंकरों पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर रही थी। इसी बीच बत्रा की टीम के दो सैनिक घायल हो गए। इस पर बत्रा उन्हें उठाकर नीचे ले जा रहे थे। इसी बीच पाकिस्तानी सैनिकों ने बत्रा को गोली मार दी, जिसके बाद कैप्टन अपने देश पर बलिदान हो गए।
इस सैनिक को बचाते हुए कैप्टन ने कहा था-आप हट जाइए, आपके बीवी-बच्चे हैं। दरअसल, युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा के एक साथी के पैरों के पास अचानक एक बम फटा। इस पर विक्रम बत्रा ने उन्हे वहां से हटाया। लेकिन कुछ देर बाद एक और ऑफिसर को बचाने में वो देश पर बलिदान हो गए। प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने के सम्मान में इस चोटी का नाम बत्रा टॉप रखा गया।
बता दें कि कारगिल युद्ध में विक्रम बत्रा का कोड नेम 'शेरशाह' था। पिता जीएल बत्रा के मुताबिक, उनके बेटे के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वाईके जोशी ने विक्रम को 'शेरशाह' नाम दिया था। कैप्टन बत्रा कहा करते थे कि या तो बर्फीली चोटी पर तिरंगा लहराकर आऊंगा, नहीं तो उसी तिरंगे में लिपटकर आऊंगा। पर आऊंगा जरुर। बत्रा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
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