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दांत से काटने से लेकर नाखून से नोचने तक के निशान... इन सबूतों के आधार पर तय हुई थी दरिंदों की मौत
नई दिल्ली. निर्भया को 7 साल 3 महीने बाद आखिर न्याय मिल ही गया। यानी तिहाड़ जेल में बंद चारों दोषियों अक्षय, विनय, मुकेश और पवन को शुक्रवार की सुबह 5.30 बजे फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। यह पहला मौका है जब तिहाड़ में एक साथ चार दोषियों को फांसी दी गई। दुष्कर्म के मामले में इससे पहले 2004 में कोलकाता के अलीपुर जेल में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। इससे पहले निर्भया के दोषियों ने फांसी से बचने के लिए गुरुवार की सुबह से लेकर फांसी से 2 घंटे पहले यानी 3.30 बजे तक कानूनी दांव पेंच चले, लेकिन उनकी कोई चाल सफल नहीं हुई। दोषियों को फांसी दिए जाने के बाद एक बार फिर दिसंबर 2012 की याद ताजा हो गई जब निर्भया के साथ दरिंदगी की घटना को अंजाम दिया गया था। ऐसे में हम आपको बताते हैं कि पुलिस ने दोषियों किन सबूतों के आधार पर पकड़ा था।
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दरिंदगी के बाद दोषियों की तलाश में जुटी पुलिस सुराग ढूंढ रही थी। ऐसे में पुलिस को जांच के दौरान निर्भया के शरीर पर राम सिंह और अक्षय के दांत की निशान मिले थे। निशान का मिलान करने पर यह दोषियों के ही निकले। कोर्ट ने कहा कि विक्टिम के शरीर पर मिले काटने के निशान सस्पेक्ट के दांतों के स्ट्रक्चर से मिलाए गए। इसकी जांच में साबित होता है शरीर पर तीन निशान रामसिंह के काटने से और एक निशान अक्षय के काटने से बना था।
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दोषियों को पकड़ने के लिए बस की लेजर स्कैनिंग, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी जैसे एडवांस टेक्नोलॉजी से जांच की गई। जहां विनय के फिंगर प्रिंट मिले। फिंगर प्रिंट की रिपोर्ट पर कोर्ट ने कहा कि यह साफ तौर पर घटना के वक्त विनय बस में मौजूद था।
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निर्भया केस की जिम्मेदारी डीसीपी छाया शर्मा के पास थी। घटना के बाद वह तीन दिन तक घर नहीं गईं। छाया शर्मा और उनकी पूरी टीम गुनाहगारों को पकड़ने के लिए जी जान से जुटी हुई थी। क्योंकि उन्हें पता था कि थोड़ी सी भी चूक हुई तो मामला हाथ से फिसल जाएगा और अपराधियों को मौका मिल जाएगा। दोषियों को पकड़ने के लिए छाया शर्मा ने 100 पुलिसकर्मियों की अगल-अलग टीमें बनाई गईं। केस के बाद छाया का ट्रांसफर मिजोरम कर दिया गया।
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18 दिन में केस की चार्जशीट कोर्ट में पेश कर दी गई। सफदरजंग अस्पताल में निर्भया ने मजिस्ट्रेस्ट के सामने तीन बयान दिए, जिसमें केस से जुड़ी अहम जानकारियां मिलीं। पुलिस को इनसे बहुत मदद मिली। 13 दिन बाद जब सिंगापुर के हॉस्पिटल में उसकी मौत हो गई तो इसे पीड़िता का आखिरी बयान माना गया।
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दोषियों को सजा दिलाने के लिए यूं तो काफी सबूत और गवाह थे, लेकिन पहली बार दुष्कर्म के मामले में आरोपियों, पीड़िता व घायल युवक के खून की जांच के लिए डीएनए टेस्ट कराए गए, जो अदालत में बड़े सबूत बने। आरोपियों के दांतों की जांच भी सफदरजंग अस्पताल में कराई गई, क्योंकि पीड़िता के शरीर पर कई जगह दांत से काटे जाने के निशान थे। फॉरेंसिक जांच के अलावा निर्भया के खून से सने कपड़ों और आरोपियों का मेडिको लीगल केस (एमएलसी) भी अहम सबूत बना।
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निर्भया गैंगरेप केस में दोषियों ने सबूत खत्म करने की भरसक कोशिश की थी। बस के ड्राइवर रामसिंह ने डिटर्जेंट से बस को साफ कर दिया था। आरोपियों का सुराग मिलने के बाद जब पुलिस टीम आरकेपुरम पहुंची तो बस की चमक और गीली सीट देखकर पुलिस का शक गहरा गया।
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पुलिस ने ऐसे सबूत जुटाए जिसे आरोपी मिटा नहीं पाए थे। जिसमें खून के धब्बे, फटे हुए सीट कवर और अन्य निशान शामिल थे। उसके बाद पुलिस ने बस ड्राइवर रामसिंह को गिरफ्तार कर लिया। जिसके बाद पुलिस ने रामसिंह से पूछताछ की तो एक-एक कर सभी दोषी पुलिस की गिरफ्त में आ गए।
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आरोपियों पर दोष सिद्ध करने के लिए पुलिस ने चार तरह से साक्ष्य जुटाए थे। जिनमें फिजिकल एविडेंस, मजिस्टि्यल एविडेंस, टेक्निकल डेटा व साइंटिफिक एविडेंस शामिल थे। पहली बार किसी केस में इस तरह से साक्ष्य जुटाए गए थे। जांच में कई तरह का प्रयोग पहली बार किया गया।
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कैसे शुरू हुई घटनाः 16 दिसंबर की रात निर्भया अपने दोस्त के साथ साकेत स्थित सलेक्ट सिटी मॉल से फिल्म देखने के बाद रात 9 बजे मुनिरका पहुंचीं। जहां से वह दोषियों की बस में द्वारका जाने के लिए सवार हुई। सभी आरोपी रविदास कैंप आरके पुरम में पार्टी करके बस लेकर निकले थे।
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अवनींद्र पांडेय : निर्भया मामले में अवनींद्र पांडेय इकलौते गवाह थे। उन्हीं की गवाही ने निर्भया को न्याय दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अवनींद्र घटना के वक्त निर्भया के साथ बस में मौजूद थे।चलती बस में जब निर्भया के साथ दरिंदगी हुई तब अवनींद्र को भी बुरी तरह पीटा गया था।
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इसके बाद उन्हें निर्भया के साथ बस से बाहर फेंक दिया गया। निर्भया के दोस्त की गवाही को निचली अदालत, दिल्ली हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने सही माना और फांसी की सजा सुनाई।
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सीमा ने दोषियों के हर पैतरेंबाजी का कोर्ट में खुलकर जवाब दिया। इसी का नतीजा ये हुआ कि एक दोषियों की एक के बाद एक याचिका खारिज होती चली गईं। सीमा को चौथे डेथ वारंट के बाद विश्वास था कि इस बार दोषियों को फांसी होकर रहेगी।
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7 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब निर्भया को न्याय मिला है। चारों दोषियों को तिहाड़ में फांसी दे दी गई। हालांकि, इससे पहले दोषियों के वकील ने फांसी टालने के लिए काफी कोशिश की। लेकिन उनकी कोई चाल कामयाब नहीं हुई।
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