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गोली लगी तो घुटनों और कोहनियों के बल चलते रहे, मिनटों में उड़ा दिए थे पाकिस्तानी टैंकों के परखच्चे

नई दिल्ली.  2 दिन बाद यानी 26 जनवरी को देश बड़े ही धूम-धाम से गणतंत्र दिवस मनाएंगा। यह भारत का 71वां गणतंत्र दिवस होगा। यानी भारतीय लोकतंत्र में कानून को लागू हुए 71 साल हो जाएंगे। इस दिन राजपथ पर परेड में एक बार फिर देश की ताकत देखकर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। देश की सुरक्षा और हमें सुरक्षित रखने के लिए देश के जाबांज जवान हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुती दे देते है। गणतंत्र दिवस से पहले हम आपको ऐस ही कुछ जवानों की कहानियां बता रहे हैं, जिनके बलिदान को याद किए बिना, हमारा गणतंत्र दिवस अधूरा है। हम बात करेंगे परमवीर चक्र व‍िजेता वीर अब्दुल हमीद के बारे में जिन्होंने अपने शौर्य से दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे।

5 Min read
Author : Asianet News Hindi
Published : Jan 24 2020, 04:42 PM IST
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यूपी के गाजीपुर जिले में एक मामूली परिवार में 1 जुलाई 1933 को जन्मे वीर हमीद के वीरता की गाथा को महज इन शब्दों में तो नहीं पिरो सकते। क्योंकि 1965 के युद्ध के दौरान वीर हमीद ने न सिर्फ पाकिस्तानी दुश्मनों के दांत ही नहीं खट्टे किए बल्कि दुश्मन देश के 7 पैटर्न टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए। इसी दौरान वह दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए। परिवार वाले बताते है कि पाकिस्तान से युद्ध के दौरान घर से न‍िकलते ही अब्दुल हमीद के साथ अपशगुन हुआ था। प‍िता ने रोका, लेकिन वह नहीं रुके। उन्होंने उस दौरान अपनी पत्नी से सिर्फ यही कहा था, ''तुम बच्चों का ख्याल रखना, अल्लाह ने चाहा तो जल्द मुलाकात होगी।'' (फाइल फोटो- परमवीर चक्र विजेता शहीद वीर अब्दुल हमीद)
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शहीद वीर अब्दुल हमीद के पिता अपने क्षेत्र के पहलवानों में गिने जाते थे, लेकिन गरीबी की वजह से आजीविका के लिए वह सिलाई का काम करते थे। बेहद तंगी की हालत में पहलवान मोहम्मद उस्मान खलीफा ने अपने बड़े बेटे वीर अब्दुल हमीद को किसी तरह 5वीं तक की पढ़ाई पूरी करवाई। लोग बताते है कि अब्दुल हमीद का मन भले ही पढ़ने में न लगता हो, लेकिन स्कूल जाते समय वह गांव के अन्य बच्चों को भी पकड़कर स्कूल पहुंचाते थे। वह चाहते थे कि गांव के सभी बच्चे अच्छी शिक्षा पाएं। (फाइल फोटो- युद्ध के दौरान की तस्वीर)
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अब्दुल हमीद ने 27 दिसंबर 1954 को भारतीय सेना में सैनिक के रुप में देश सेवा शुरू की। सेना में भर्ती होने के बाद सबसे पहली बार 1962 में भारत-चीन युद्ध में अब्दुल हमीद ने अपनी वीरता दिखाई। गोलियों से घायल होने के बावजूद घुटनों और कोहनियों के बल पर चलते हुए अब्दुल ने चीन द्वारा कब्जा कर लिए गए 14-15 किलोमीटर एरिया को क्रॉस करते हुए भारत-चीन के ओरिजिनल बॉर्डर पर तिरंगा लहराया था। युद्ध के दौरान भारतीय सेना को पता नहीं था कि अब्दुल हमीद जिंदा हैं। युद्ध खत्म होने के बाद जब पीछे से गई सेना की टुकड़ियों ने सैनिकों को शाम को बटोरना शुरू किया तो उन्हीं के बीच घायल हालत में अब्दुल हमीद मिले। वीरता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें नेशनल सेना मेडल दिया। (फाइल फोटो- पाकिस्तान से युद्ध के दौरान की तस्वीर)
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भारतीय थल सेना में तैनात अब्दुल हमीद जब 33 साल के थे, 1965 की भारत-पाक जंग के दौरान दुश्मन देश की फौज ने अभेद पैटर्न टैंकों के साथ 10 सितम्बर को पंजाब प्रांत के खेमकरन सेक्टर में हमला बोला। भारतीय थल सेना की चौथी बटालियन की ग्रेनेडियर यूनिट में तैनात कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद अपनी जीप में सवार दुश्मन फौज को रोकने के लिए आगे बढ़े। पैटर्न टैंकों का ग्रेनेड के जरिए सामना करना शुरु कर दिया। दुश्मन फौज हैरत में पड़ गई और भीषण गोलाबारी के बीच पलक झपकते ही अब्दुल हमीद के अचूक निशाने ने पाक सेना के पहले पैटर्न टैंक के परखच्चे उड़ा दिए। (फाइल फोटो- शहीद वीर अब्दुल हमीद की पत्नी का सम्मान करते हुए पीएम मोदी)
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मोर्चा संभाले अब्दुल हमीद ने पाक फौज की अग्रिम पंक्ति के सात पैटर्न टैंकों को चंद मिनटों मे ही धराशायी कर डाला। पाक फौज के पैटर्न टैंकों से निकला एक गोला अब्दुल हमीद की जीप पर आ गिरा। देश की सरहद की सुरक्षा मे तैनात गाजीपुर के इस लाल ने सन् 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान न सिर्फ दुश्मन देश के 7 पैटर्न टैंकों के परखच्चे उड़ाकर पाक सेना के दांत खट्टे कर दिए, बल्कि वतन की रक्षा करते हुए अपनी जान की कुर्बानी दे दी। (फाइल फोटो- वीर अब्दुल हमीद की पत्नी एक कार्यक्रम के दौरान)
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भारत-पाक के बीच 1965 में युद्ध छिड़ा। उस समय अब्दुल हमीद छुट्टियों में घर आए हुए थे। रेडियो पर सूचना मिलते ही उन्होंने पिता से छिपाते हुए सिर्फ पत्नी रसूलन बीबी से कहा, ''मेरी छुट्टियां खत्म हो गई हैं और मुझे वापस जाना होगा।'' उन्होंने पूरे परिवार से युद्ध शुरू होने की बात छि‍पाई, ताकि कोई रोक न पाए। उन्होंने चुपके से अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया। अब्दुल के वापस जाने की सूचना सिर्फ उनकी पत्नी को और दोस्त बच्चा सिंह को थी। उन्होंने अपने दोस्त से कहा था कि वह भोर में चुपके से साइकिल लेकर घर के बाहर आ जाएंगे, ताकि कुछ सामान रेलवे स्टेशन तक पहुंचाया जा सके। (फाइल फोटो- पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, वीर अब्दुल हमीद की पत्नी का सम्मान करते हुए)
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भोर में चुपके से अब्दुल हमीद घर से निकलने ही वाले थे कि उनके पिता ने उन्हें टोका, ''हमीद कहां जा रहे हो।'' उन्होंने युद्ध की बात छि‍पाते हुए अपने पिता से कहा, छुट्टियां खत्म हो गई हैं और वापस जाना पड़ेगा। इसी वक्त बिस्तरबंद को बानते वक्त उसकी रस्सी टूट गई। अपशगुन मानते हुए पिता ने उन्हें काफी रोका, लेकिन वह नहीं माने। इसके बाद अब्दुल हमीद ने अपनी पत्नी रसूलन बीबी से कहा, ''तुम बच्चों का ख्याल रखना, अल्लाह ने चाहा तो जल्द मुलाकात होगी।'' (फाइल फोटो- पाकिस्तान से युद्ध के दौरान की तस्वीर)
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वह घर से निकले तो पत्नी अपने बच्चों के साथ दरवाजे पर खड़ी होकर उनको जाते हुए देखती रहीं। स्टेशन छोड़ने के लिए उनके पिता और उनके दोस्त निकल पड़े। स्टेशन पहुंचते-पहुंचते सुबह 7:00 बजे वाली ट्रेन छूट गई और फिर 9:00 बजे वाली ट्रेन पर हमीद सवार हुए। पिता ने कहा, ''बेटा जल्द लौट के आना।'' लेकिन किसी ने नहीं सोचा था वह अब नहीं आएंगे। (फाइल फोटो- वीर शहीद को वीरता के लिए मिले सम्मान)
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शहादत के एक हफ्ते बाद 16 सितम्बर 1965 को भारत सरकार ने देश का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र देने की घोषणा की। 26 जनवरी 1966 गणतंत्र दिवस पर तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने वीर अब्दुल हमीद की बेवा पत्नी रसूलन बीबी को परमवीर चक्र प्रदान किया। फिल्मकार चेतन आनंद द्वारा बनाए गए टीवी सीरियल परमवीर चक्र विजेता में मशहूर कलाकार नसीरुद्दीन शाह ने अब्दुल हमीद की भूमिका निभाई। जबकि, आर्मी पोस्टल सर्विस की ओर से वीर अब्दुल हमीद की स्मृति में 10 सितम्बर 1979 और 28 जनवरी 2000 को डाक टिकट जारी किए गए। (फाइल फोटो- 1965 युद्ध के दौरान की तस्वीर)

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