अटलजी बिहारी वाजपेयी का एक वो फैसला, जिसने PAK छोड़िए अमेरिका तक को हिला दिया था

First Published 16, Aug 2019, 11:41 AM IST

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी का 93 साल की उम्र में 16 अगस्त, 2018 निधन हो गया था। मोदीजी की तरह अटलजी भी अपने कड़े फैसलों के लिए जाने जाते थे। 1998 में राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण इसका एक उदाहरण है। आइए जानते हैं पोखरण की कहानी।

जयपुर. 11 मई, 1998 को राजस्थान के पोखरण में भारत ने 3 परमाणु परीक्षण किए थे। इसके साथ ही भारत न्यूक्लियर पॉवर बन गया था। अटलजी ने 19 मार्च, 1998 को दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी। यह एक मिलीजुली सरकार थी, लिहाजा अटलजी के लिए कोई भी कड़ा फैसला लेना आसान नहीं था। फिर भी अटलजी ने मोदी की तरह फैसला लेने में कोई झिझक नहीं की। अटलजी के इस सपने को साकार करने में पूर्व राष्ट्रपति, जिन्हें मिसालमैन के नाम से भी पुकारा जाता है एपीजे अब्दुल कलाम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

जयपुर. 11 मई, 1998 को राजस्थान के पोखरण में भारत ने 3 परमाणु परीक्षण किए थे। इसके साथ ही भारत न्यूक्लियर पॉवर बन गया था। अटलजी ने 19 मार्च, 1998 को दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी। यह एक मिलीजुली सरकार थी, लिहाजा अटलजी के लिए कोई भी कड़ा फैसला लेना आसान नहीं था। फिर भी अटलजी ने मोदी की तरह फैसला लेने में कोई झिझक नहीं की। अटलजी के इस सपने को साकार करने में पूर्व राष्ट्रपति, जिन्हें मिसालमैन के नाम से भी पुकारा जाता है एपीजे अब्दुल कलाम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अब जानें पोखरण की कहानी: परमाणु परीक्षण की दुनिया में किसी को कोई भनक नहीं थी। भारतीय सेना की 58 इंजीनियरिंग रेजिमेंट ने इस परीक्षण को सफल करने की जिम्मेदारी अपने कांधे पर उठाई थी। यह परीक्षण तब हुआ, जब अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पूरी तरह से पाकिस्तान का सपोर्ट कर रही थी। लाजिमी है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर यह परीक्षण नहीं होने देता। दरअसल, 1974 में भी भारत ने परमाणु परीक्षण की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका ने अड़ंगा लगा दिया था।

अब जानें पोखरण की कहानी: परमाणु परीक्षण की दुनिया में किसी को कोई भनक नहीं थी। भारतीय सेना की 58 इंजीनियरिंग रेजिमेंट ने इस परीक्षण को सफल करने की जिम्मेदारी अपने कांधे पर उठाई थी। यह परीक्षण तब हुआ, जब अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पूरी तरह से पाकिस्तान का सपोर्ट कर रही थी। लाजिमी है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर यह परीक्षण नहीं होने देता। दरअसल, 1974 में भी भारत ने परमाणु परीक्षण की कोशिश की थी, लेकिन अमेरिका ने अड़ंगा लगा दिया था।

मिसालमैन ने रखा था झूठा नाम: परमाणु परीक्षण की जानकारी किसी को न लगे, इसलिए फूंक-फूंककर पांव रखे जा रहे थे। अब्दुल कलाम डीआरडीओ के अध्यक्ष थे।  परीक्षण को पूरी तरह गोपनीय रखने कलाम ने खुद को कर्नल पृथ्वीराज के तौर पर प्रस्तुत किया था। वे परीक्षण के पहले कभी साइट पर नहीं  गए। हालांकि CIA उन पर नजर रखे हुए थी, लेकिन वो भी धोखा खा गई। कलाम ने कर्नल गोपाल कौशिक के साथ मिलकर प्लानिंग की थी।

मिसालमैन ने रखा था झूठा नाम: परमाणु परीक्षण की जानकारी किसी को न लगे, इसलिए फूंक-फूंककर पांव रखे जा रहे थे। अब्दुल कलाम डीआरडीओ के अध्यक्ष थे। परीक्षण को पूरी तरह गोपनीय रखने कलाम ने खुद को कर्नल पृथ्वीराज के तौर पर प्रस्तुत किया था। वे परीक्षण के पहले कभी साइट पर नहीं गए। हालांकि CIA उन पर नजर रखे हुए थी, लेकिन वो भी धोखा खा गई। कलाम ने कर्नल गोपाल कौशिक के साथ मिलकर प्लानिंग की थी।

ऑपरेशन शक्ति नाम दिया गया: परमाणु परीक्षण की प्लानिंग को ऑपरेशन शक्ति नाम दिया गया था। इसे 10 मई, 1998 की रात को पूरा किया गया। ऑपरेशन के दौरान कुछ कोड वर्ड्स भी बनाए गए थे। जैसे-व्‍हाइट हाउस, ताज महल, कुंभकरण आदि।

ऑपरेशन शक्ति नाम दिया गया: परमाणु परीक्षण की प्लानिंग को ऑपरेशन शक्ति नाम दिया गया था। इसे 10 मई, 1998 की रात को पूरा किया गया। ऑपरेशन के दौरान कुछ कोड वर्ड्स भी बनाए गए थे। जैसे-व्‍हाइट हाउस, ताज महल, कुंभकरण आदि।

कई देशों ने भारत पर लगा दिया था प्रतिबंध: परीक्षण वाले दिन सुबह 3 बजे आर्मी  के तीन ट्रकों में भरकर सामान पोखरण पहुंचाया गया था। इससे पहले एयरफोर्स के एएन-32 एयरक्रॉफ्ट से उसे मुंबई के सीएसटी इंटरेनशनल एयरपोर्ट से जैसलमेर बेस तक लाया गया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका तो जैसे बौखला गया था। चीन, कनाडा और जापान ने उसका साथ दिया। चारों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि यूके, रूस और फ्रांस ने चुप्पी साध ली।

कई देशों ने भारत पर लगा दिया था प्रतिबंध: परीक्षण वाले दिन सुबह 3 बजे आर्मी के तीन ट्रकों में भरकर सामान पोखरण पहुंचाया गया था। इससे पहले एयरफोर्स के एएन-32 एयरक्रॉफ्ट से उसे मुंबई के सीएसटी इंटरेनशनल एयरपोर्ट से जैसलमेर बेस तक लाया गया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका तो जैसे बौखला गया था। चीन, कनाडा और जापान ने उसका साथ दिया। चारों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि यूके, रूस और फ्रांस ने चुप्पी साध ली।

दुनिया को दिया संदेश: 11 मई को अटलजी ने अपने सरकारी आवास 7 रेसकोर्स में एक प्रेस कान्फ्रेंस के जरिये परमाणु परीक्षण की सफलता की जानकारी दुनिया को दी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत के पास भले ही परमाणु बम की शक्ति है, लेकिन वो कभी किसी को नुकसान नहीं पहुचाएगा।

दुनिया को दिया संदेश: 11 मई को अटलजी ने अपने सरकारी आवास 7 रेसकोर्स में एक प्रेस कान्फ्रेंस के जरिये परमाणु परीक्षण की सफलता की जानकारी दुनिया को दी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत के पास भले ही परमाणु बम की शक्ति है, लेकिन वो कभी किसी को नुकसान नहीं पहुचाएगा।

पहले टालना पड़ा था परीक्षण: जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, तब दिसंबर, 1996 में परमाणु परीक्षण की पूरी तैयारी कर ली गई थी। हालांकि उसे टालना पड़ा। इसके बाद जब अटलजी प्रधानमंत्री बने, तब भी परमाणु परीक्षण की तैयारी थी। लेकिन उनकी सरकार महज 13 दिन चली। ऐसे में एक बार फिर परीक्षण रद्द हो गया।

पहले टालना पड़ा था परीक्षण: जब पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे, तब दिसंबर, 1996 में परमाणु परीक्षण की पूरी तैयारी कर ली गई थी। हालांकि उसे टालना पड़ा। इसके बाद जब अटलजी प्रधानमंत्री बने, तब भी परमाणु परीक्षण की तैयारी थी। लेकिन उनकी सरकार महज 13 दिन चली। ऐसे में एक बार फिर परीक्षण रद्द हो गया।

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