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महिलाओं को बाजार में कोड़े मारना, पत्थर मारते हुए हत्या कर देना...ऐसा है Taliban का Sharia Law
काबुल. सरकार के गठन के बाद पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में तलिबान (Taliban) ने साफ कर दिया कि वह अफगानिस्तान में शरीयत या इस्लामी कानून के तहत ही शासन करेगा। कोई भी मामला होगा उसे शरिया कानून के हिसाब से ही निपटाया जाएगा। मीडिया और महिलाओं के अधिकारों को मुद्दों को इस्लामी कानून के दायरे में ही छूट दी जाएगी। महिलाओं के लिए शरिया कानून के क्या मतलब है?

तालिबान (Taliban) को शरिया कानून की शख्त व्याख्या के लिए जाना जाता है, जिसमें दोषी हत्यारों और मिलावटखोरों को पब्लिक प्लेस में फांसी देने जैसी सजा है। दरअसल, शरीयत इस्लाम की कानूनी सिस्टम है। ये इस्लाम की पवित्र किताब कुरान, पैगंबर मुहम्मद के कामों को बताने वाली सुन्नत और हदीस से लिया गया है।
शरिया जीने के लिए एक कोड की तरह काम करता है, जिसमें नियम दिए गए हैं। शरिया एक मुसलमान के लिए दैनिक जीवन के हर पहलू की जानकारी दे सकता है। जैसे कि एक मुसलमान सोच रहा है कि अगर उसके किसी साथी ने काम के बाद पब में बुलाया है, तो उसे क्या करना चाहिए? ऐसे में वह शख्स सलाह लेने के लिए शरिया एक्सपर्ट की मदद ले सकता है। ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि अपने धर्म के कानूनी ढांचे में ही काम हुआ।
शरिया कानून के तहत कुछ अपराधों की लिस्ट तैयार की गई है, जैसे- चोरी। अडल्ट्री। किसी अपराधी के खिलाफ दोष साबित हो जाता है। इन अपराधों की शरिया में कड़ी सजा देने का नियम है। शरीयत में इस बात का भी जिक्र है कि कब और कैसे प्रार्थना करनी है। शादी और तलाक के नियम भी दिए गए हैं।
शरीयत के हिसाब से कोई भी महिला बिना किसी पुरुष को साथ लिए घर से बाहर नहीं निकल सकती है। वहीं महिलाओं को नौकरी करने की आजादी है लेकिन उसमें भी कई कंडीशन हैं।
तालिबान के लिए शरिया का मतलब?
तालिबान शरिया कानून की अपनी तरह से व्याख्या करता है। साल 1996-2001 तक उसने अफगानिस्तान पर राज किया तब भी शरिया कानून के तहत ही सत्ता चलाई। तब उन्होंने टीवी और म्यूजिक सिस्टम पर रोक लगा दिया था। उन्होंने ऐसी सामग्री के प्रचार प्रसार पर भी रोक लगाने के लिए टीम बना दी।
मोरेलिटी पुलिस ऑफिसर्स ने ड्रेस, बातचीत और प्रोटेस्ट पर रोक लगा दिया था। ये पुलिस ऑफिसर्स पिकअप ट्रकों में घूमते थे और पब्लिक में ही नियम तोड़ने वाली महिलाओं को अपमानित करते और कोड़े मारते थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, 1996 में अफगानिस्तान के काबुल में एक महिला ने नेल पॉलिश लगाया तो तालिबान ने उसका अगूंठा ही काट दिया था।
हालांकि अबकी बार तालिबान का कहना है कि वह महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करेगा। उन्हें शिक्षा और नौकरी का अधिकार देगा। लेकिन शर्त रखी है कि ये सब शरिया कानून के तहत ही होगा। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है शायद इस बाद तालिबान शरियत की अपने हिसाब से व्याख्या करे और उसमें महिलाओं के अधिकारों की जगह दे।
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