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बुर्ज खलीफा जितनी बड़ी ये 'मुसीबत' मिसाइल की रफ्तार से बढ़ रही धरती की तरफ, मचा सकती है तबाही

First Published Nov 24, 2020, 2:39 PM IST
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नई दिल्ली. साल 2020 में दुनिया की परेशानियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। कोरोना, क्लाइमेट चेंज जैसी तमाम चीजों का सामना लोग कर रहे हैं। इसी बीच एक परेशान करने वाली खबर और आ रही है। दरअसल, एक उल्कापिंड के पृथ्वी की तरफ काफी तेजी से बढ़ रहा है। यह छोटा मोटा उल्कापिंड नहीं, बल्कि यह दुनिया की सबसे ऊंची इमारत दुबई की बुर्ज खलीफा जितना बड़ा बताया जा रहा है। 
 

नासा के मुताबिक, उल्कापिंड का नाम 153201 2000 WO107 है। यह 29 नवंबर यानी रविवार को धरती के पास से गुजरेगा। यह उल्कापिंड 90 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से नीचे आ रहा है। इसका साइज 820 मीटर के आसपास बताया जा रहा है। जबकि बुर्ज खलीफा 829 मीटर ऊंचा है। 
 

नासा के मुताबिक, उल्कापिंड का नाम 153201 2000 WO107 है। यह 29 नवंबर यानी रविवार को धरती के पास से गुजरेगा। यह उल्कापिंड 90 हजार किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से नीचे आ रहा है। इसका साइज 820 मीटर के आसपास बताया जा रहा है। जबकि बुर्ज खलीफा 829 मीटर ऊंचा है। 
 

इस उल्कापिंड की स्पीड का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुपरसोनिक मिसाइलों की रफ्तार भी 6000 किमी प्रति घंटा तक होती है। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की औसत दूरी 3 लाख 85 किमी है। 
 

इस उल्कापिंड की स्पीड का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुपरसोनिक मिसाइलों की रफ्तार भी 6000 किमी प्रति घंटा तक होती है। पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की औसत दूरी 3 लाख 85 किमी है। 
 

इस उल्कापिंड की गति और साइज देखकर नासा ने भी चिंता जताई है। अगर यह पृथ्वी पर गिरता तो काफी नुकसान होता। लेकिन नासा का कहना है कि यह पृथ्वी से नहीं टकराएगा। नासा ने इसे नियर अर्थ ऑब्जेक्ट बताया है। 

इस उल्कापिंड की गति और साइज देखकर नासा ने भी चिंता जताई है। अगर यह पृथ्वी पर गिरता तो काफी नुकसान होता। लेकिन नासा का कहना है कि यह पृथ्वी से नहीं टकराएगा। नासा ने इसे नियर अर्थ ऑब्जेक्ट बताया है। 

नासा के मुताबिक, 4.6 बिलियन साल पहले बने हमारे सोलर सिस्टम के चट्टानी, वायुहीन अवशेषों को उल्कापिंड कहा जाता है। अब तक नासा 10 लाख उल्कापिंडों का पता लगा चुका है। 2020 में इससे पहले भी कई उल्कापिंड धरती के नजदीक से गुजर चुके हैं। 

नासा के मुताबिक, 4.6 बिलियन साल पहले बने हमारे सोलर सिस्टम के चट्टानी, वायुहीन अवशेषों को उल्कापिंड कहा जाता है। अब तक नासा 10 लाख उल्कापिंडों का पता लगा चुका है। 2020 में इससे पहले भी कई उल्कापिंड धरती के नजदीक से गुजर चुके हैं। 

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