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Buxar Jail: भारत की इकलौती जेल जहां बनती है फांसी की रस्सी, क्या आप इसका नाम जानते हैं?
भारत में आज भी फांसी की सजा का नियम लागू है। हाल ही में एक हत्या के मामले में दो दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फांसी देने के लिए इस्तेमाल होने वाली रस्सी कहां बनती है? आइए कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं।

भारत में फांसी की रस्सी बनाने का केंद्र
भारत उन देशों में शामिल है जहां आज भी मौत की सजा दी जाती है। हमारे देश में दोषियों को फांसी पर लटकाया जाता है। इसके लिए एक खास तरह की रस्सी का इस्तेमाल होता है। साल 2012 के निर्भया केस के दोषियों, संसद हमले के दोषी अफजल गुरु और मुंबई हमले के आतंकी अजमल कसाब को इसी खास रस्सी से फांसी दी गई थी। बिहार की बक्सर सेंट्रल जेल पूरे देश में इकलौती ऐसी जगह है, जहां यह रस्सी बनती है। गंगा नदी के किनारे बसे होने के कारण यहां की नमी धागे बनाने के लिए एकदम सही है। अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ यह काम आज भी जारी है। कसाब जैसे कई खूंखार अपराधियों को फांसी देने के लिए रस्सियां यहीं से मंगवाई गई थीं।

फांसी की रस्सी का नाम क्या है?
फांसी के लिए इस्तेमाल होने वाली इस खास रस्सी को 'मनीला' कहते हैं। इसे बनाने के लिए 'J-34' किस्म की रुई के धागों का इस्तेमाल होता है। कारीगर अपने हाथों से करीब 7,200 पतले धागों को गूंथकर इसे तैयार करते हैं। रस्सी बीच में टूटे नहीं और इससे गर्दन न कटे, इसके लिए इस पर गाय का घी, सरसों का तेल, केले का गूदा और गंगाजल लगाया जाता है। इससे रस्सी मुलायम और बेहद मजबूत बन जाती है।
इस्तेमाल से पहले रस्सी की टेस्टिंग
हर फांसी की रस्सी करीब 16 फीट लंबी होती है। जेल अधिकारी इसे बाहर भेजने से पहले इसकी कड़ी टेस्टिंग करते हैं। दोषी के वजन से दोगुना भारी रेत का बोरा लटकाकर इसका ट्रायल होता है। इसके बाद इसे धूप और बारिश से बचाकर खास लकड़ी के बक्सों में पैक करके भेजा जाता है। यह कोई आम चीज नहीं है जो बाजार में मिल जाए। कोर्ट या जेल प्रशासन से पक्का ऑर्डर मिलने के बाद ही बक्सर जेल में इसे बनाने का काम शुरू होता है।