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लालू यादव से मिलने पहुंचा उनका 85 साल का दोस्त, बताईं पुरानी यादें..कभी ठुकरा दिया था सांसद का टिकट

 राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव (RJD Supremo Lalu Yadav) से मिलने वालों की संख्या भी रोज बढ़ रही है। काफी लोग उनसे मुलाकात करने के लिए बिहार से रांची आ रहे हैं। इसी बीच लालू से मिलने के लिए पिछले एक सप्ताह से उनके बचपन के दोस्त 85 साल के बुजुर्ग सीताराम सिंह पहुंचे।

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Ranchi, First Published Sep 24, 2020, 7:21 PM IST
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रांची. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) के लिए निर्वाचन आयोग (Election Commission) भले ही अभी तारीखों का ऐलान नहीं किया है, लेकिन यहां की सियासत जोरों पर है। इन दिनों हर कोई राज्ये के बड़े नेता से मिलना चाह रहा है। वहीं राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव (RJD Supremo Lalu Yadav) से मिलने वालों की संख्या भी रोज बढ़ रही है। काफी लोग उनसे मुलाकात करने के लिए बिहार से रांची आ रहे हैं। इसी बीच लालू से मिलने के लिए पिछले एक सप्ताह से उनके बचपन के दोस्त 85 साल के बुजुर्ग सीताराम सिंह जा रहे हैं, लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो पा रही है। इस दौरान उन्होंने अपना दर्द और पुरानी यादें मीडिया से शेयर की हैं। बता दें कि इन दिनों लालू यादव चारा घोटाला मामले में रांची में सजा काट रहे और वह फिलहाल रिम्स के केली बंगले में रह रहे हैं।

इसलिए लालू से मिलना चाहते हैं उनके दोस्त
दरअसल, सीताराम सिंह रोहतास के करगहर विधानसभा के रहने वाले हैं। वह गुरुवार को रांची रिम्स पहुंचे थे, वह अपनी विधानसभा से अपने साथी उमाशंकर गुप्ता नामक शख्स को चुनाव का टिकट दिलवाना चाहते हैं। इसलिए लालू से मिलना चाहते हैं, लेकिन कई दिनों से उनकी मुलाकात ही नहीं हो पा रही है।  1 हफ्ते से रोज केली बंगले का चक्कर लगा रहे हैं। हालांकि उनका कहना है कि जल्द ही वह लालू से मिलेंगे।

त्याग ऐसा कि अपना सांसद का टिकट दूसरे को दे दिया था
इस दौरान उन्होंने बताया कि वह युवा अवस्था में लालू के साथ आंदोलन के दौरान बिताए दिन उन्हें आज भी याद है। वह अपने दोस्त लालू के साथ एक चौकी में कई रात गुजार चुके हैं। सीताराम बताते हैं कि 1977 में रोहतास के दिनारा विधानसभा से उन्हें जनता पार्टी की ओर से लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया था। लेकिन उन्होंने यह टिकट उस समय के सांसद अवधेश बाबू के दबाव में शिवपूजन सिंह को दिलवा दिया था। उनका कहना है कि पहले दोस्ती और त्याग परंपरा होती थी, जिसके तहत मैंने यह टिकट उनको दे दिया था।

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