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भारत की इस जगह नहीं जलाए जाते रावण के पुतले, विजयदशमी पर्व मनाया जाता है शोक

आज पूरे भारत में विजयदशमी का त्योहार मनाया जा रहा है। लेकिन एक जगह ऐसी है जहां पर दशहरे के दिन त्योहार नहीं बल्कि शोक मनाया जाता है।

Dussehra festival does not celebrate here, people cry on vijayadashami dva
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First Published Oct 5, 2022, 8:59 AM IST

लाइफस्टाइल डेस्क : 5 अक्टूबर 2022 को दशहरे (Dussehra 2022) का पर्व मनाया जा रहा है। 9 दिन तक शारदीय नवरात्रि के बाद दसवें दिन विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन को मनाने के पीछे कई कारण है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। ऐसे में लोग हर साल दशहरे पर रावण का पुतला दहन करते हैं। पूरे भारत में यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में एक जगह ऐसी भी है जहां दशहरे पर रावण के मरने का शोक मनाया जाता है और यहां कभी भी रावण के पुतले नहीं जलाए जाते है। तो चलिए आपको बताते हैं इस जगह के बारे में...

यहां नहीं होता रावण का पुतला दहन
राजस्थान की जोधपुर के एक छोटे से गांव चांदपोल में रावण दहन नहीं किया जाता है, बल्कि यहां रावण की मृत्यु पर शोक मनाया जाता है। हर साल दशहरे के मौके पर लोग त्योहार नहीं बल्कि शोक मनाते हैं। दरअसल, कहा जाता है कि इसी जगह पर रावण का विवाह मंदोदरी के साथ हुआ था। इतना ही नहीं यहां के मेहरानगढ़ किले पर रावण का मंदिर भी बनाया गया है। इसके पास ही मंदोदरी का मंदिर भी है। इस मंदिर में दोनों की विशाल मूर्तियां स्थापित की गई है जहां पर उनकी पूजा की जाती हैं।

क्या है मान्यता 
दरअसल, दशहरे के दिन रावण दहन ना करने की और दशहरे पर शोक मनाने की मान्यता के पीछे कारण है कि यह है कि जोधपुर में रहने वाले श्रीमाली ब्राह्मण खुद को रावण का वंशज मानते हैं। इसी कारण अपने पूर्वज की मृत्यु के दिन वह दशहरे पर शोक व्यक्त करते हैं। ऐसी मान्यता है कि अगर यहां पर रावण दहन होगा या दशहरे को त्योहार के रूप में मनाया जाएगा, तो उनका कुल खत्म हो जाएगा और उनका वंश आगे नहीं बढ़ पाएगा।

यहां भी नहीं मनाया जाता दशहरा
जोधपुर के चांदपोल गांव के अलावा कर्नाटक के कोलार में भी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है, बल्कि यहां पर नवरात्रि के नौ दिनों तक रावण की पूजा की जाती है। इतना ही नहीं उनकी शोभा यात्रा भी निकाली जाती है। दरअसल, यहां पर दशहरे को फसल की पूजा के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। यहां पर इसे लंकेश्वर महोत्सव भी कहा जाता है।
 

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