साहिल खान ने हत्या की बात कबूल कर ली है। सीसीटीवी फुटेज को जब उसके सामने रखा गया तो बताया कि उसने ही साक्षी को मारा है। हत्यारे ने अपना गुनाह तो कबूल कर लिया, लेकिन उन लोगों का क्या जो आते जाते वारदात को होते देख रहे थे?

रिलेशनशिप डेस्क. 16 साल की साक्षी अब इस दुनिया में नहीं है। सिरफिरे आशिक साहिल ने बड़ी बेरहमी से बीच सड़क पर उसकी हत्या कर दी। हैवानियत ऐसी कि अनगिनत बार उसे चाकू से फिर पत्थर से कई बार उसका सिर कुचल दिया। सीसीटीवी फुटेज में वारदात की तस्वीर जब सामने आई लोग अंदर तक हिल गए। साहिल लड़की को चाकू मारता रहा, पत्थर से कुचलता रहा और लोग मूकदर्शक बने देखते रहे, वहां से गुजरते रहे। आखिर वहां मौजूद लोगों ने क्यों नहीं नाबालिग साक्षी को बचाया? ये सवाल सबके मन में है। Aisanet Hindi ने लोकबंधु अस्पताल के साइकैट्रिस्ट और यूपी सरकार के सचिवालय में कंसल्टेंट डॉ. पी के श्रीवास्तव से इसका जवाब जानने की कोशिश की।

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सवाल का जवाब जानने से पहले वो वीडियो जरूर एक बार देख लीजिए जिसके बारे में हम बात करने वाले हैं। किस तरह नाबालिग साक्षी को दर्दनाक मौत दी गई। पहले तो साहिल ने उसपर कई बार चाकू से वार किया। फिर लातों से मारा। इसके बाद भी जब मन नहीं भरा तो बड़े से पत्थर से उसे कई बार कुचला। इस दौरान लोग आते-जाते देखते रहे। हालांकि एक शख्स ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की। लेकिन जब वो नहीं रुका तो डर के मारे वो भी वहां से भाग गया। एक महिला भी वहां से गुजरी, लेकिन उसने भी उसे बचाने की या फिर किसी से मदद मांगने की हिम्मत नहीं दिखाई। तो चलिए जानते हैं कि भीड़ की मनोदशा ऐसी वारदात के दौरान क्या होती है।

लोग आते-जाते क्यों वारदात को होते देखते रहे?

साइकैट्रिस्ट पी के श्रीवास्तव - जब भी कोई व्यक्ति इस तरह की खतरनाक वारदात कर रहा होता है तो लोगों को लगता है कि कहीं ऐसा ना हो कि वो हम पर भी हमला कर दे। इसलिए वो बचाने के लिए आगे नहीं आते हैं। जैसा कि इस केस का वीडियो सामने आया है, उसे देखकर लगता है कि लोग बहुत ही कैजुअली वहां से निकल रहे हैं। देखकर ऐसा लगता है कि वहां कई लोग उसे जानने वाले हैं। एक आदमी ने हाथ पकड़ने की कोशिश की। लेकिन वो भी डर कर भाग गया।

भीड़ के अंदर किस बात का डर ज्यादा होता है?

साइकैट्रिस्ट पी के श्रीवास्तव- पहला तो लोगों को यह डर होता है कि कहीं वो पलटकर उन पर ना हमला कर दे। दूसरा ये भीड़ में हर व्यक्ति यही सोचता है कि कोई दूसरा मदद के लिए आगे बढ़ेगा, तो दूसरा व्यक्ति तीसरे की तरफ देखता है। ऐसा करते हुए कोई भी क्राइम को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाता और देखता रह जाता है। लोगों को ये भी लगता है कि अगर वो आगे आते हैं तो फिर पुलिस की निगाह में आ जाएंगे और उनसे सवाल-जवाब किया जाएगा। लोगों की मनोदशा ऐसी होती है कि वो फालूतों के पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते।

इस तरह की वारदात को कैसे रोकें?

साइकैट्रिस्ट पीके श्रीवास्तव- भीड़ को एक साथ मिलकर हमलावर को रोकने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। आखिर वो कितनों को मारने की कोशिश करेगा। अपराधी की मनस्थिति बहुत डर वाली होती है। एक साथ लोगों को आता देखकर वो क्राइम करने से बचना चाहेगा और वहां से भागना चाहेगा। भीड़ को बहुत शोर के साथ वारदात वाली जगह पर अप्रोच करना चाहिए। तभी ऐसे क्राइम को रोकने में मदद मिल सकती है।

लड़कियां प्यार में सही गलत का फर्क क्यों नहीं कर पाती हैं?

साइकैट्रिस्ट पी के श्रीवास्तव- एक महिला पुरुष से ज्यादा जान सकती है कि सामने वाला कैसा है। उनका सिक्स्थ सेंस काफी मजबूत होता है। ऐसा नहीं है कि वो लड़के को पहचान नहीं पाती हैं। लेकिन वो उसके बहकावे में आ जाती हैं। इसके अलावा वो उम्र के ऐसे दौर में होती हैं कि उनके अंदर किसी चीज को जानने और महसूस करने की क्यूरोसिटी होती है। इसकी वजह से वो सही-गलत में फर्क नहीं कर पातीं।

माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी भी बनती है वजह?

साइकैट्रिस्ट पी के श्रीवास्तव- ऐसे मामलों में मां-बाप का बच्चों के साथ लैक ऑफ कम्यूनिकेशन जरूर होगा। तभी ऐसी चीजें घटती हैं और बच्चों को बाहरवालों पर ज्यादा भरोसा हो जाता है। बाहर वालों से उन्हें वो चीजें मिलने लगती हैं जो उन्हें घर में नहीं मिलती हैं।

ऐसे वारदात से कैसे बचेंगी बच्चियां?

साइकैट्रिस्ट पी के श्रीवास्तव- पैरेंट्स और बच्चों के बीच कम्यूनिकेशन गैप को दूर करने की बहुत जरूरत है। बच्चियां जब घर पर आकर बाहरवालों के बारे में बताने लगेंगी तो इस तरह की वारदात नहीं होगी। पैरेंट्स अपने बच्चों को सौ प्रतिशत गाइड करेंगे। उन्हें घर में इतना प्यार मिलेगा कि बाहरवालों के प्यार की जरूरत कम उम्र में महसूस नहीं होगी।

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