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जिंदगी में 2 बार सांसें उखड़ने लगी थीं, फिर जिस बीमारी से जीती लड़ाई अब उसी से बचा रही लोगों की जान

अकसर बीमारियां लोगों का हौसला तोड़ देती हैं। दूसरा, बीमारी से उबरने के बाद लोग उसके बारे में सोचना तक पसंद नहीं करते, लेकिन 12 वीं की यह छात्रा एक मिसाल बनकर सामने आई है। यह लड़की जिस बीमारी से पीड़ित थी, उससे लड़ाई जीतने के बाद लोगों को जागरूक कर रही है। यह लड़की गांव-गांव साइकिल पर घूमकर लोगों से लक्षण पूछती है। अगर किसी को बीमारी के लक्षण दिखते हैं, तो उनका इलाज कराती है। यह लड़की खुद 2 बार इस बीमारी से बचकर निकली है।

Khandwa Success Story, the story of a girl making people aware of TB disease  kpa
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Khandwa, First Published Jul 20, 2020, 10:01 AM IST
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खंडवा, मध्य प्रदेश. आपने एक कमर्शियल एड देखा होगा। इसका स्लोगन है-डरके आगे जीत है। सचमुच जहां से डर खत्म होता है, जीत वहीं से शुरू होती है। अकसर बीमारियां लोगों का हौसला तोड़ देती हैं। दूसरा, बीमारी से उबरने के बाद लोग उसके बारे में सोचना तक पसंद नहीं करते, लेकिन 12 वीं की यह छात्रा एक मिसाल बनकर सामने आई है। यह लड़की जिस बीमारी से पीड़ित थी, उससे लड़ाई जीतने के बाद लोगों को जागरूक कर रही है। यह लड़की गांव-गांव साइकिल पर घूमकर लोगों से लक्षण पूछती है। अगर किसी को बीमारी के लक्षण दिखते हैं, तो उनका इलाज कराती है। यह लड़की खुद 2 बार इस बीमारी से बचकर निकली है। 

मिलिए कौन है यह लड़की...

यह हैं खंडवा जिले के देवलीकला गांव की रहने वाली आदिवासी लड़की वर्षा। ये 12वीं की छात्रा हैं। पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियां संभालने के अलावा ये सामाजिक दायित्व भी निभा रही हैं। ये अपने और आसपास के गांवों में साइकिल से जा-जाकर लोगों को टीबी की बीमारी से जागरूक कर रही हैं। वे लोगों ने पूछती हैं कि कहीं उन्हें खांसी तो नहीं आ रही...? अगर किसी को टीबी के लक्षण दिखते हैं, तो वो उसे गांवों में लगने वाले कैंप तक पहुंचाती हैं। वर्षां कई लोगों की जांच करा चुकी हैं। इनमें से कई ठीक भी हो गए। वर्षा बताती हैं कि कुछ साल पहले उन्हें खुद टीबी हो गया था। यह बीमारी दूसरी बार लौटकर आई थी। इसका इलाज करते हुए उन्हें लंबे समय तक गोलियां खानी पड़ीं। कई बार तो ऐसा कि टीबी उनकी जान ले लेगी। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अब वे ठीक होकर दूसरों को इस बीमारी से जागरूक कर रही हैं। वर्षा की इस मुहिम में एक एनजीओ मप्र जनसेवी संगठन की अक्षय परियोजना सहयोग कर रही है। 


संस्था के दिलीप उमरिया ने बताया कि 2017 में वर्षा खुद टीबी का शिकार हो गई थी। करीब 6 महीने उसका इलाज चला। तब लगा कि वो ठीक हो गई है। अचानक कुछ महीने बाद उसे खून की उल्टियां होने लगीं। उसका फिर से इलाज कराया गया। टीबी की स्थिति अंतिम चरण में पहुंच गई थी। उसका लंबा इलाज चला। रोज कई प्रकार की दवाइयां खानी पड़ीं। इंजेक्शन लगवाने पड़े। अब वो ठीक हो गई है, तो लोगों को जागरूक कर रही है।

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