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75th Independence Day: चौरीचौरा-जहां से जली क्रांति की मशाल ने गोरों को कर दिया खौफजदा

आजादी के संघर्षों वाले इतिहास के पन्ने जब भी पलटे जाएंगे तो देश के कुछ स्थान हमेशा गर्व से प्रफुल्लित करेंगे। आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर हम आपको ऐसे ही कुछ जगहों के बारे में आपसे रूबरू कराएंगे। आजाद भारत को बनाने में इन जगहों का क्या रहा है योगदान और कैसी है यह हमारी ऐतिहासिक विरासत। 

75th Independence Day: the untold story of chauri chaura which play important role in India's freedom
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Gorakhpur, First Published Aug 7, 2021, 11:00 AM IST
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नई दिल्ली। यूपी के गोरखपुर से करीब 27 किलोमीटर दूर चौरीचौरा आजादी की लड़ाई का प्रमुख पड़ाव रहा है। किसानों पर अत्याचार की खिलाफत ने ऐसा रूप लिया कि पूरा देश चौरीचौरा कांड के बाद उद्वेलित हो गया। इस आंदोलन में हुई हिंसा से बापू तो बेहद दु:खी हुए और अपना असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। हालांकि, महामना के भतीजे और बापू के सुपुत्र ही चौरीचौरा पर रिपोर्ट बनाकर पूरे देश को तथ्यों से परिचित कराने के लिए गोरखपुर भेजे भी गए थे। 

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क्या है चौरीचौरा कांड?

फरवरी 1922 में किसानों ने अत्याचार के खिलाफ आंदोलन किया था। आंदोलित किसानों को चौरीचौरा में पुलिस वालों ने रोकने की कोशिश की। 4 फरवरी 1922 को किसानों-व्यापारियों के इस आंदोलन को रोकने के लिए अंग्रेजों ने बल प्रयोग किया। अंग्रेजों की गोली से कई किसान ढेर हो गए। इसके बाद भीड़ का सब्र जवाब दे गया। लोगों ने चौरीचौरा थाने में आग लगा दी। इसमें थानेदार गुप्तेश्वर सिंह समेत डेढ़ दर्जन से अधिक पुलिसवाले जिंदा जला दिए गए। देखते ही देखते चौरीचौरा कांड पूरे देश के आंदोलनकारियों में जोश भर दिया। 
उधर, अंग्रेजी हुकूमत इस घटना के बाद पूरी तरह से हिल गए। वह धरपकड़ तेज कर दिए। आंदोलन के बाद कई सौ लोगों को जेल में ठूस दिया गया। 

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चौरीचौरा कांड में 172 आंदोलनकारियों को फांसी की सजा सुनाई

अंग्रेजी हुकूमत ने इस आंदोलन में शामिल भगवान अहीर समेत 172 आंदोलनकारियों को इस घटना का दोषी करार दिया था। 9 जुलाई 1922 को सेशन कोर्ट ने 172 आंदोलनकारियों को फांसी की सजा सुनाई थी। चौरीचौरा की घटना के बाद पूरा देश यहां के आंदोलनकारियों के समर्थन में आ गया। लेकिन उच्च न्यायालय में अपील के लिए एक मजबूत अधिवक्ता की जरूरत थी। 

स्थानीय अधिवक्ताओं ने महामना से की अपील

स्थानीय अधिवक्ताओं केएन मालवीय, गोकुल दास, डीएन मालवीय, केसी श्रीवास्तव, एपी दुबे ने हाईकोर्ट में अपील के लिए महामना मदन मोहन मालवीय से अनुरोध किया। महामना इसके लिए सहर्ष राजी हो गए। 6 मार्च 1923 को हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई। महामना ने मजबूती से क्रांतिकारियों के पक्ष में पैरवी कर रहे थे। पूरे देश की निगाहें इस बड़ी घटना पर आने वाले फैसले पर टिकी हुई थी। महामना ने भी जोरदार पैरवी की। नजीतन यह कि अंग्रेजी हुकूमत को भी उनके आगे झुकना पड़ा और 156 लोग फांसी से बच गए। हालांकि, 19 क्रांतिवीर फांसी पर चढ़ा दिए गए।

घटना की रिपोर्ट तैयार की महामना के भतीजे और बापू के बेटे ने

कांग्रेस ने चौरीचौरा कांड से जुड़ी एक रिपोर्ट तैयार करने की सोची ताकि हकीकत पूरे देश के सामने आए और वीर सेनानियों को अंग्रेजी चंगुल से रिहा कराया जा सके। पूरी घटना की रिपोर्ट के लिए कांग्रेस ने रिपोर्ट तैयार कराने के लिए महामना के भतीजे सीके मालवीय और महात्मा गांधी के सुपुत्र देवधर गांधी को गोरखपुर भेजा। दोनों चौरीचौरा पहुंचे और एक रिपोर्ट तैयार की। 

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लेकिन इस घटना से बापू हो गए विचलित और...

महात्मा गांधी को जब चौरीचौरा कांड के बारे में जानकारी हुई तो वह विचलित हो गए। अहिंसात्मक आंदोलन से पूरे देश को जगाने वाले बापू इस कांड से इतना विचलित हो गए कि असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। 

क्या था असहयोग आंदोलन?

दरअसल, बापू ने अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को एकजुट करने का काम कई साल पहले शुरू कर दिया था। 1914-18 का दौर था जब पूरा देश बापू के आह्वान पर रॉलेट एक्ट के विरोध में खड़ा हो गया। हालांकि, अंग्रेजी हुकूमत ने एक्ट को और कड़ाई से लागू किया। रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह से पूरे देश को एक धागे में पिरोने में महात्मा गांधी सफल हो रहे थे। उनके एक आह्वान पर देश जीने मरने लग रहा था। बापू अहिंसात्मक रूप से ब्रिटिश औपनिवेश को खदेड़ने में लग गए। उन्होंने पूरे देश से गोरों और सरकार के खिलाफ असहयोग की मांग रख दी। 1 अगस्त 1920 से देश भर में असहयोग आंदोलन शुरू हो गया।

महात्मा गांधी ने आह्वान किया कि असहयोग आंदोलन के तहत भारतीय अपने सभी संबंधों को अंग्रेजों से तोड़ लेंगे। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, न्यायालय नहीं जाएंगे। हम कर भी कोई नहीं चुकाएंगे। किसी प्रकार का सहयोग उपनिवेश को नहीं करेंगे। बापू का मानना था कि एक साल तक यह जारी रहा तो अहिंसात्मक रूप से उपनिवेशवाद का भारत से खात्मा कर देंगे। अंग्रेजी लेखक लुई फिशर ने लिखा है कि 1857 के ग़दर के बाद यह अंग्रेजी नींव हिलाने वाला पहला आंदोलन था। बताया जाता है कि अंग्रेजी उपनिवेश की स्थिति खराब होने लगी।

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बापू के असहयोग आंदोलन स्थगित करने से खुश नहीं थे दिग्गज क्रांतिकारी

हालांकि, उनके निर्णय से युवा क्रांतिकारी खुश नहीं थे। उनका मानना था कि देश का जोश चरम पर पहुंच रहा, आजादी की लड़ाई के लिए यह बेहद खास है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आंदोलन स्थगित करने के निर्णय की आलोचना की। यह कांड वैचारिक रूप से कांग्रेस को दो फांक कर दिया एक नरम दल जिसके नायक वे लोग थे जो अहिंसात्मक रूख के हिमायती थे। दूसरा गरम दल जिसमें भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, सुखदेव जैसे युवा थे। दोनों ने अपनी लड़ाइयों को जायज ठहराया और देश के लिए सर्वस्व न्योछावर किया।

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