पैगंबर मोहम्मद को लेकर कथिततौर पर गलत बयान देने वाली भाजपा से सस्पेंड नुपूर शर्मा के एक समर्थक का यह चौंकाने वाला फोटो twitter पर शेयर किया गया है। इसमें नुपूर को कड़ी फटकार लगाने से नाराज समर्थक ने सुप्रीम कोर्ट को ही नसीहत दे डाली। पढ़िए पूरा मामला...

नई दिल्ली. पैगंबर मोहम्मद को लेकर कथिततौर पर गलत बयान देने वाली भाजपा से सस्पेंड नुपूर शर्मा ने अपने खिलाफ देशभर में दर्ज सभी FIR को दिल्ली शिफ्ट करने की गुहार लगाई है। इसे लेकर 19 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की है। कोर्ट ने दोपहर बाद सुनवाई के दौरान नुपुर शर्मा को राहत देते हुए उनको गिरफ्तार नहीं करने का आदेश दिया है। इस बीच twitter पर नुपूर के किसी समर्थक की एक तस्वीर शेयर की गई है। गौरव(@Gaurav38251011) twitter हैंडल से शेयर इस तस्वीर में सुप्रीम कोर्ट के बाहर एक शख्स पोस्टर लिए खड़ा है। इस पर लिखा है-'न्यायपालिका को निवेदन-अपनी लक्ष्मण रेखा न लांघे-समस्त हिंदू समाज।'

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सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में लगा दी थी बेवजह फटकार
नूपुर शर्मा के इसी मामले में 1 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से मना कर दिया था। इसके बाद नुपूर ने एक नई याचिका लगाई थी। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने नुपूर शर्मा को कड़ी फटकार लगा दी थी। बता दें कि नूपुर ने अपने खिलाफ 8 राज्यों में दर्ज 9 एफआईआर में गिरफ्तारी पर रोक की मांग करते हुए सभी मामलों एक साथ जोड़ कर दिल्ली ट्रांसफर करने का अनुरोध किया है। याचिका में केंद्र के अलावा 8 राज्यों- दिल्ली, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर और असम को अपना पक्ष बनाया है। नुपूर शर्मा ने उन्हें मिल रहीं धमकियों को देखते हुए सभी मामले दिल्ली ट्रांसफर करने के लिए पिटीशन दाखिल की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आज देश में जो हो रहा है उसके लिए यह महिला अकेले जिम्मेदार है। कोर्ट उदयपुर व अन्य जगहों पर पैगंबर पर टिप्पणी के बाद हुई हिंसा को भी नुपुर शर्मा के गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी को ही दोषी माना था।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी की निंदा हुई थी
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के खिलाफ देश के 117 हस्तियों ने बयान जारी कर SC की टिप्पणी पर आपत्ती जताई थी। 15 रिटायर्ड जज, 77 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और 25 रिटायर्ड आर्म्ड फोर्स के अधिकारियों ने बयान जारी कर कहा थ कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार की रक्षा करने के बजाय, याचिका का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने और उचित फोरम (उच्च न्यायालय) के पास जाने को कहा, वो ये जानते हुए कि हाईकोर्ट के पास ट्रांसफर का अधिकार क्षेत्र नहीं है।

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