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ये कैसा पाखंडः कृषि बिलों के विरोधी कांग्रेस से पवार तक कभी इन्हें बता चुके हैं किसान हितैषी, ये रहा सबूत

पंजाब और हरियाणा के किसान इन कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। किसानों ने राजधानी और आस पास के इलाकों में डेरा डाल रखा है। खास बात ये है कि कांग्रेस, एनसीपी और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल भी किसानों के इस आंदोलन से अपनी रोटियां सेंकने की कोशिश में जुटी हैं। जबकि इन कृषि कानूनों के आने से पहले कांग्रेस सत्ता में रहकर इन बिलों को लाने की कोशिश में जुटी रही है।

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New Delhi, First Published Dec 16, 2020, 2:58 PM IST
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नई दिल्ली. देश के किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने इस साल जून में कृषि से संबंधित तीन कानून लाई है। सरकार का कहना है कि ये तीनों बिल खेती और किसानों की तकदीर बदलने वाला एक बड़ा कदम है। वहीं, पंजाब और हरियाणा के किसान इन कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। किसानों ने राजधानी और आस पास के इलाकों में डेरा डाल रखा है। खास बात ये है कि कांग्रेस, एनसीपी और आम आदमी पार्टी जैसे राजनीतिक दल भी किसानों के इस आंदोलन से अपनी रोटियां सेंकने की कोशिश में जुटी हैं। जबकि इन कृषि कानूनों के आने से पहले कांग्रेस सत्ता में रहकर इन बिलों को लाने की कोशिश में जुटी रही है। यहां तक की कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में भी इसका जिक्र किया। वहीं, शरद पवार 2010 में केंद्रीय कृषि मंत्री रहते हुए इन सुधारों को लाने के लिए मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिख चुके हैं। आईए देखते हैं कि कैसे राजनीतिक पार्टियों ने मोदी के विरोध के लिए किसानों को अपना हथियार बनाया है। 

कांग्रेस : कभी इन्हीं बिलों को बता रही थी किसान हितैषी

- 2019 के घोषणापत्र में किया था वादा
कांग्रेस ने 2019 लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में वादा किया था कि सरकार बनने के बाद किसानों को अपनी उपज सरकारी मंडियों में ही बेचने की अनिवार्यता को खत्म करेगी। इसी के साथ किसान कहीं भी अपनी उपज बेच पाएंगे। उस वक्त भारतीय किसान यूनियन ने कांग्रेस के इस ऐलान का स्वागत किया था। आज भारतीय किसान यूनियन कृषि कानूनों का विरोध कर रही है। 

खास बात ये है कि मोदी सरकार के जिन कानूनों का कांग्रेस आज विरोध कर रही है, उनमें से एक किसान उपज व्‍यापार एवं वाणिज्‍य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक, 2020 भी है, जिसमें प्रावधान है कि किसान अपनी फसल कहीं भी बेच पाएंगे। 

पूर्व कांग्रेस नेता ने खोली पोल
कांग्रेस से निष्कासित नेता संझय झा ने कांग्रेस को आइना दिखाया था। उन्होंने ट्वीट किया था, मित्रों, हमारे कांग्रेस के 2019 के घोषणापत्र में हमने खुद ही एपीएमसी एक्ट को खत्म करने और किसानों को दलालों के चंगुल से आजाद कराने का वादा किया था। आज मोदी सरकार ने किसान बिल के जरिए वही किया है। किसानों के मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों एक ही पेज पर हैं। 

- 2014 के घोषणा पत्र में भी था जिक्र
2014
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने यही घोषणा की थी। इसके बाद  कर्नाटक, असम, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और हरियाणा में कांग्रेस ने सत्ता में रहते किसानों को APMC एक्ट से अलग कर कहीं भी उपज बेचने का अधिकार दे दिया था।

2013 में राहुल गांधी ने कांग्रेस की सरकार वाले राज्यों से कहा था कि वे फल और सब्जियों को एपीएमसी एक्ट से बाहर करेंगे। उन्होंने इस एक्ट में बदलाव की बात भी कही थी।  
 
2011 में यूपीए सरकार के दौरान योजना आयोग ने अपनी रिपोर्ट में Inter-State Agriculture Produce Trade and Commerce Regulation एक्ट को निष्क्रिय कर केंद्र की लिस्ट से हटाने का सुझाव दिया था। 

कांग्रेस ने 9 साल पहले किसानों के लिए इन बिलों को बताया था हितैषी 
कांग्रेस ने 2011-12 में Agricultural Produce Inter State Trade and Commerce (Development and Regulation) Bill 2012 तैयार किया था। लेकिन सरकार इस बिल पर आगे नहीं बढ़ पाई। इससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस इसी बिल को 9 साल पहले लेकर आई थी। इस बिल पर कई कांग्रेस शासित राज्यों ने काम भी किया। लेकिन अब कांग्रेस ने इन बिलों पर अपना रूख एकदम से बदल लिया है। 

शरद पवार: कभी इन्हीं सुधारों को लागू करने के लिए मुख्यमंत्रियों को लिखा था पत्र

2010-11 में यूपीए सरकार में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर एपीएमसी एक्ट को लागू करने और स्टेट एपीएमसी एक्ट्स में संशोधन के लिए कहा था। उस वक्त शरद पवार ने कहा था कि एपीएमसी (एग्री प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी) विधेयक में किसानों के हित में संशोधन किया जा सकता है। उन्होंने मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया था। जिससे किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए वैकल्पिक माध्यम मिल सके। उन्होंने कहा था कि इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा।
 


शरद पवार ने शीला दीक्षित को यह पत्र लिखा था। 
 
राज्यसभा में औपचारिक जवाब में भी की थी वकालत

तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने मई 2012 में राज्यसभा में एक औपचारिक जवाब दिया था। इसमें उन्होंने ऐग्रिकल्चर मार्केटिंग रिफॉर्म का समर्थन किया था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था, ''कुछ सिफारिशें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं, जैसे कृषि उपज की खरीद के उदारीकरण का प्रस्ताव…हमने सभी राज्यों के सहकारिता मंत्रियों से एपीएमसी एक्ट में संशोधन करने का अनुरोध किया है।''


अरविंद केजरीवाल : कृषि कानूनों को पहले ही कर चुके लागू
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने किसानों के प्रदर्शन का समर्थन किया है। उन्होंने किसानों के समर्थन में एक दिन का उपवास भी किया था। लेकिन खास बात ये है कि जिन बिलों का किसान विरोध कर रहे हैं, केजरीवाल सरकार उन्हें पहले ही लागू कर चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब केजरीवाल सरकार किसानों की हितैषी है तो ये बिल लागू क्यों किए?

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