वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने लिखा- शराब की दुकानें खोलकर हमारी केंद्र सरकार और राज्य सरकारें बुरी तरह से बदनाम हो रही हैं। बदनामी तो उन्होंने अपने पिछले कई कारनामों से भी कमाई है लेकिन इस वक्त शराबियों का जो नज्जारा सड़कों पर दिखाई पड़ रहा है, वैसा भारत में पहले कभी दिखाई नहीं पड़ा। दुनिया में भारत की बदनामी हो रही है। शराब की दुकानों पर डेढ़-डेढ़, दो-दो किमी लंबी लाइनें लगी हुई हैं और लोग इतनी बोतलें लादे हुए घर लौट रहे हैं कि भारत के आम लोग उन्हें देखकर चकित हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा है कि भारत में इतने शराबी हैं। विदेशों में जो लोग हमारे टीवी चैनलों को देख रहे हैं, वे पूछ रहे हैं कि यह भारत है या दारुकुट्टों का कोई देश है ? मैंने उनसे कहा है कि भारत से कई गुना ज्यादा शराबियों के देश यूरोप और अमेरिका में हैं लेकिन भारत में शराब प्रायः लुक-छिपकर पी जाती है। अब से 60-70 साल पहले शराब की कलालियां मोहल्लों के बाहर किसी दूर-दराज के कोने में हुआ करती थीं लेकिन अब उसकी दुकानें बाजारों और बस्तियों में हैं। इसीलिए शराबियों की लंबी कतार लोगों का ध्यान खींच रही हैं। इतनी लंबी कतारें तो मैंने कभी यूरोप, अमेरिका और रुस में भी नहीं देखीं। हमारे यहां शारीरिक दूरी के नियम की धज्जियां उड़ गईं। सरकारों ने पहले से कोई इंतजाम ही नहीं किया। इसमें पियक्कड़ों का दोष क्या है ? उन्होंने तो शराब पिए बिना 40 दिन काट दिए लेकिन हमारी महान सरकारें शराब को बेचे बिना एक दिन भी नहीं काट सकीं। तालाबंदी को ढीला करते ही उन्होंने शराब की दुकानें खुलवा दीं। क्योंकि शराब से उन्हें लगभग दो लाख करोड़ रु. टैक्स मिलता है। हमारे नेता, जो अपने आपको गांधी, गोलवलकर, सरदार पटेल, जयप्रकाश और लोहिया का अनुयायी कहते हैं, उन्हें जरा भी ख्याल नहीं आया कि पैसों के खातिर वे अपना ईमान लुटाने पर आमादा हो गए। संविधान के नीति-निर्देशक प्रावधान के उल्लंघन पर उतारु हो गए। वे चाहें तो दो लाख करोड़ रु. अपनी दवाइयां और आयुर्वेदिक नुस्खे बेचकर और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ते पड़े तेल को जमा करके कमा सकते हैं। यदि बिहार और गुजरात शराबबंदी करके भी दनदना सकते हैं तो दूसरे राज्यों का क्या दिवाला खिसक जाता ? सिर्फ एक दिन में 1000 करोड़ रु. की शराब बिकवाकर हमारी सरकारों ने क्या कोरोना-राक्षस की सेवा नहीं की है ? शराब से मनुष्यों की प्रतिरोध-शक्ति बढ़ेगी या घटेगी ? भाजपा और संघ के संस्कारों में ढली केंद्र-सरकार से मैं यह आशा करता था कि वह शराब से पैसे कमाने के राज्यों के इस दुराग्रह को रद्द करती और 40 दिन के इस मजबूरी के संयम को सदा के लिए स्वाभाविक बना देती और शराब पर कानूनी प्रतिबंध लगा देती।