दिल्ली दंगा मामले में शरजील इमाम ने जमानत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मुकदमे में देरी और अपनी लंबी हिरासत को आधार बनाया है. शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई होनी है.
नई दिल्ली [भारत], 16 जुलाई (एएनआई): शरजील इमाम ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित बड़ी साजिश के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है. गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज इस मामले में उन्होंने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी. उनकी अपील पर शुक्रवार को जस्टिस प्रथिबा एम सिंह और जस्टिस विकास महाजन की डिवीजन बेंच के सामने सुनवाई होनी है.
याचिका में क्या दलीलें दी गईं?
इमाम ने कड़कड़डूमा कोर्ट के 4 जुलाई के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसने उन्हें नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया था. अपनी अपील में इमाम ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश के बाद छह महीने से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन मुकदमे में कोई सार्थक प्रगति नहीं हुई है.
उन्होंने दलील दी है कि आरोप तय करने पर बहस अभी भी पूरी नहीं हुई है और वह लगभग छह साल से हिरासत में हैं. वकील अहमद इब्राहिम के जरिए दायर की गई अपील में कहा गया है कि मुकदमे में लंबी देरी और लगातार हिरासत में रहना परिस्थितियों में बदलाव के समान है, जो जमानत देने का एक मजबूत आधार है.
इमाम ने सह-आरोपी तस्लीम अहमद को अंतरिम जमानत देने वाले सुप्रीम कोर्ट के 22 मई के आदेश का भी हवाला दिया है. साथ ही UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत से संबंधित कानूनी मुद्दे को एक बड़ी बेंच को भेजे जाने का भी जिक्र किया है. याचिका के अनुसार, यह एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम है जिस पर उनकी जमानत अर्जी पर फैसला करते समय विचार किया जाना चाहिए.
निचली अदालत ने क्यों खारिज की थी याचिका?
4 जुलाई को कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने शरजील इमाम और सह-आरोपी उमर खालिद की नियमित जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं. अदालत ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश से बंधी है, जिसने उनकी पिछली जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें केवल अभियोजन पक्ष द्वारा निर्भर संरक्षित गवाहों की जांच के बाद या एक साल बाद, जो भी पहले हो, फिर से जमानत मांगने की अनुमति दी थी. चूंकि दोनों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई थी, इसलिए निचली अदालत ने माना कि जमानत आवेदन सुनवाई योग्य नहीं थे.
अभियोजन पक्ष का क्या था तर्क?
अभियोजन पक्ष ने यह तर्क देते हुए याचिकाओं का विरोध किया था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ है. उसने यह भी बताया कि उमर खालिद की पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है. यह मामला 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के पीछे की कथित बड़ी साजिश से संबंधित है. (एएनआई)
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