एफआईआर में बताया गया कि टीम की पब्लिश रिपोर्ट में झूठी, मनगढ़ंत और प्रायोजित तथ्य थे। इससे विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा मिला।

Supreme Court on Editors Guild of India report on Manipur Violence: एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया पर मणिपुर हिंसा की रिपोर्ट प्रकाशित करने के मामले में हुए एफआईआर पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मणिपुर पुलिस की एफआईआर में उल्लिखित ग्रुप्स के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि महज रिपोर्ट देने से कैसे अपराध हो सकता है। मणिपुर में एडिटर्स गिल्ड की फैक्ट फाइंडिंग टीम के तीन मेंबर्स पर एफआईआर दर्ज हुआ है। टीम ने राज्य में हुई हिंसा पर एक रिपोर्ट पब्लिश की थी। एफआईआर में बताया गया कि टीम की पब्लिश रिपोर्ट में झूठी, मनगढ़ंत और प्रायोजित तथ्य थे। इससे विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा मिला।

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सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई...

शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने कहा कि प्रथम दृष्टया, एफआईआर में उल्लिखित अपराध बनता नहीं दिख रहा है। जिस शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई है, उसमें अपराध का कोई संकेत नहीं है। सीजेआई ने कहा कि एडिटर्स गिल्ड को आर्मी द्वारा मणिपुर में आमंत्रित किया गया था। सीजेआई ने कहा, “मिस्टर सॉलिसिटर जनरल, आर्मी एडिटर्स गिल्ड को लिखती है कि पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग हुई थी। इसके बाद एडिटर्स गिल्ड की टीम रिपोर्ट देने के लिए ग्राउंड पर जाती है। वे सही या गलत हो सकते हैं लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी का यही मतलब है।

बेंच ने शिकायतकर्ता से मांगा जवाब कि क्यों एफआईआर रद्द न हो

बेंच ने शिकायतकर्ता से पूछा कि यह एफआईआर क्यों रद्द नहीं की जानी चाहिए? इसका जवाब दो सप्ताह के भीतर दें। कोर्ट ने पत्रकारों को दी गई राहत को बढ़ाते हुए यह कहा कि जबतक जवाब दाखिल न हो जाए, तबतक, कोई कार्रवाई नहीं होगी।