सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महाराष्ट्र में शिक्षा और रोज़गार में मराठा समुदाय को आरक्षण देने वाले 2018 के कानून पर रोक लगा दी है। साल 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए यह आरक्षण कानून बनाया था। 

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महाराष्ट्र में शिक्षा और रोज़गार में मराठा समुदाय को आरक्षण देने वाले 2018 के कानून पर रोक लगा दी है। साल 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े वर्गों के लिए यह आरक्षण कानून बनाया था।

जस्टिस एल नागेश्वर राव की तीन-जजों की पीठ ने यह मामला कॉन्स्टीट्यूशन बेंच को सौंप दिया है। अब चीफ जस्टिस एसए बोबडे इसकी सुनवाई के लिए नई बेंच का गठन करेंगे। यह आरक्षण 30 नवंबर 2018 को महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठा समुदाय को दिया था जो 16% आरक्षित था।


कई याचिकाओं की चुनौतियां -

शिक्षा और रोज़गार संबंधी नौकरियों में मराठों को आरक्षण देने वाले कानून की वैधता को कई अलग अलग याचिकाओं द्वारा चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन्होंने 2018 के कानून का पहले लाभ लिया है, उन्हें अब परेशान नहीं किया जा सकता।

महाराष्ट्र सरकार दे चुकी है भरोसा -

महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को साल 2018 में भरोसा दिया था कि वह अलग-अलग विभागों के साथ हेल्थ और मेडिकल एजुकेशन को छोड़कर 12% मराठा आरक्षण के आधार पर भर्ती प्रक्रिया को 15 सितंबर से आगे नहीं बढ़ाएगी।

विशेष समुदाय के नाम पर दिया जा सकता है आरक्षण -

संविधान के 102वें संशोधन के मुताबिक, राष्ट्रपति की ओर से तैयार की गई सूची में किसी विशेष समुदाय का नाम होने पर ही आरक्षण दिया जा सकता है। महाराष्ट्र विधानसभा ने मराठों को 16% आरक्षण देने के लिए एक विधेयक पारित किया था जिसमें सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 16% आरक्षण देने की व्यवस्था की गई थी।

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