केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने दिल्ली के एक अस्पताल में गुरूवार शाम 74 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। राम विलास पासवान की 6 दिन पहले ही बाईपास सर्जरी हुई थी। रामविलास पासवान ने बिहार के खगड़िया के काफी दुरुह इलाके शहरबन्नी से निकलकर दिल्ली की सत्ता तक का सफर अपने संघर्ष के बूते तय किया था। 

नई दिल्ली. केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने दिल्ली के एक अस्पताल में गुरूवार शाम 74 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। राम विलास पासवान की 6 दिन पहले ही बाईपास सर्जरी हुई थी। रामविलास पासवान ने बिहार के खगड़िया के काफी दुरुह इलाके शहरबन्नी से निकलकर दिल्ली की सत्ता तक का सफर अपने संघर्ष के बूते तय किया था। उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लिहाजा वह पांच दशक तक बिहार और देश की राजनीति में छाये रहे। इस दौरान दो बार उन्होंने लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक मतों से जीतने का विश्व रिकॉर्ड भी कायम किया। 2016 में उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल से अपने जीवन की एक अनोखी घटना शेयर किया था. जब वह DSP के एग्जाम में पास हुए उसी समय वह MLA भी बन गए थे। तब उनके एक दोस्त ने उनसे पूछा कि गवर्नमेंट बनना चाहते हो या फिर सर्वेंट! इसके बाद पासवान राजनीति में आ गए। 

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रामविलास पासवान देश के छह प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट में मंत्री रहे। राजनीति की नब्ज पर उनकी पकड़ इस कदर रही कि वह वोट के एक निश्चित भाग को इधर से उधर ट्रांसफर करा सकते थे। यही कारण है कि वह राजनीति में हमेशा प्रभावी भूमिका निभाते रहे। इनके राजनीतिक कौशल का ही प्रभाव था कि उन्हें यूपीए में शामिल करने के लिए सोनिया गांधी खुद चलकर उनके आवास पर गई थीं।

विभिन्न अनुभवों से भरा रहा जीवन
राम विलास पासवान का जीवन विभिन्न अनुभवों से भरा रहा। चार नदियों से घिरे दलितों के गांव की ज्यादातर उपजाऊ जमीन बड़ी जातियों के लोगों के कब्जे में थी, जो यहां खेती करने और काटने आते थे। ऐसा नहीं था कि पासवान को मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ा था लेकिन आसपास ऐसे हालात देखने को खूब थे। पिताजी के मन में बेटे को पढ़ाने की ललक ऐसी कि उसके लिए कुछ भी करने को तैयार। पहला हर्फ गांव के दरोगा चाचा के मदरसे में सीखा। 

हॉस्टल में रहते हुए फिल्मों लगा फिल्म देखने का शौक 
हॉस्टल में रहते हुए फिल्मों का चस्का भी खूब लगा। लिहाजा घर से आए अनाज के कुछ हिस्से को सामने के दुकानदार के पास बेचकर फिल्म का शौक भी पूरा करने लगे। खैर पढ़ाई पूरी होने लगी तो घर से नौकरी का दबाव भी बढ़ने लगा। दरोगा बनने की परीक्षा दी पर पास न हो सके। लेकिन कुछ ही दिन बाद डीएसपी की परीक्षा में पास हो गए। घर में खुशी का माहौल था लेकिन पासवान के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। 

कांग्रेस के खिलाफ टिकट मिला और चुनाव जीते
पासवान के गृह जिला खगड़िया के अलौली विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना था और वह घर जाने की बजाय पहुंच गए टिकट मांगने सोशलिस्ट पार्टी के दफ्तर। उस वक्त कांग्रेस के खिलाफ लड़ने के लिए कम ही लोग तैयार हुआ करते थे। सो टिकट मिल भी गया और वे जीत भी गए। पिताजी का दबाव पुलिस अफसर बनने पर था लेकिन दोस्तों ने कहा- सर्वेंट बनना है या गवर्नमेंट, ख़ुद तय करो। उसके बाद पासवान राजनीति की भूलभुलैया में उतरे तो पांच दशक तक सितारे के तरह चमकते ही रहे।