बांग्लादेश के J-10CE फाइटर जेट सौदे ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। चीन, लालमोनिरहाट एयरबेस और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बीच क्या बन रहा है नया रणनीतिक समीकरण? दक्षिण एशिया में हवाई शक्ति संतुलन बदलने की आहट।
नई दिल्ली/ढाका: दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक (Geopolitical) नक्शे पर एक नई और बेहद संवेदनशील हलचल शुरू हो गई है। बंगाल की खाड़ी से लेकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर तक रणनीतिक संतुलन बदलने की तैयारी है। खबरों के मुताबिक, भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश ने चीन से 24 एडवांस्ड J-10CE मल्टीरोल फाइटर जेट्स खरीदने की महत्वाकांक्षी योजना पर अंतिम मुहर लगाने का मन बना लिया है।

यह सौदा कितना अहम है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी आगामी चीन यात्रा के दौरान 25 जून को चीनी प्रीमियर ली और 26 जून को राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आमने-सामने मुलाकात करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, इस हाई-प्रोफाइल बैठक का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला नतीजा यही फाइटर जेट डील होने वाली है। रक्षा क्षेत्र में होने वाले इस बड़े उलटफेर ने भारत के रणनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
J-10CE आखिर इतना खास क्यों है?
चीन के चेंगदू एयरोस्पेस द्वारा विकसित J-10CE आधुनिक युद्ध के लिए तैयार एक उन्नत मल्टीरोल फाइटर है। यह विमान लंबी दूरी की "बियॉन्ड विजुअल रेंज" (BVR) लड़ाई, तेज़ प्रतिक्रिया क्षमता और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों से लैस माना जाता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह विमान न केवल बांग्लादेश वायु सेना की क्षमताओं को बढ़ाएगा, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी प्रभाव डाल सकता है। प्रत्येक विमान की अनुमानित कीमत लगभग 40 मिलियन डॉलर बताई जा रही है, जिससे यह पश्चिमी लड़ाकू विमानों की तुलना में अपेक्षाकृत किफायती विकल्प बनता है।
भारत की चिंता का असली कारण क्या है?
भारत की सबसे बड़ी चिंता इस सौदे के बाद इन अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की संभावित तैनाती को लेकर है। बांग्लादेश ने हाल ही में अपने लालमोनिरहाट एयरबेस (BAF स्टेशन लालमोनिरहाट) को फिर से सक्रिय करने की योजना का ऐलान किया है। दूसरे विश्व युद्ध के समय का यह 'एलाइड एयरफ़ील्ड' उत्तरी बांग्लादेश में स्थित है, जो भारतीय सीमा से महज 12-15 किलोमीटर की दूरी पर है। सबसे संवेदनशील बात यह है कि यह एयरबेस भारत की रीढ़ कहे जाने वाले रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बेहद करीब है। चर्चाएं हैं कि इस एयरबेस को आधुनिक बनाने और वहां नए फाइटर एयरक्राफ्ट हैंगर बनाने में चीन सीधे तौर पर मदद कर रहा है। सीमा के इतने करीब चीनी विमानों के लिए ठिकाना बनना नई दिल्ली के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है, क्योंकि युद्ध की स्थिति में सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर दबाव बनाने की यह एक सोची-समझी चीनी चाल हो सकती है।
'डुअल-फ्रंट एयर डायनामिक' और पाकिस्तान कनेक्शन
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश का यह कदम भारत के खिलाफ एक नया और खतरनाक 'डुअल-फ्रंट एयर डायनामिक' (दो मोर्चों पर हवाई चुनौती) पैदा कर सकता है। दरअसल, भारत का एक और पड़ोसी देश पाकिस्तान पहले से ही चीन में बने 36 चेंगदू J-10CE फाइटर जेट्स के बेड़े का इस्तेमाल कर रहा है। खतरनाक बात यह है कि खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारत के खिलाफ इन्हीं विमानों का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी, जिसे भारतीय वायु सेना (IAF) ने नाकाम कर दिया था। अब अगर बांग्लादेश भी इसी घातक हथियार से लैस हो जाता है, तो भारत को पूर्व और पश्चिम, दोनों सीमाओं पर एक जैसे चीनी हथियारों की चुनौती का सामना करना पड़ेगा, जिससे चीन का क्षेत्रीय प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा।
40 मिलियन डॉलर का 'किलर मशीन' और एशिया का बदलता मिजाज
चेंगदू J-10C को रक्षा विशेषज्ञ एक बेहद फुर्तीला, दमदार और किफायती फाइटर जेट मानते हैं। यह विमान 'बियॉन्ड-विजुअल-रेंज' (BVR) कॉम्बैट यानी दृश्य सीमा से परे जाकर दुश्मन को मार गिराने की तकनीक में माहिर है। J-10CE इसी एडवांस्ड जेट का एक्सपोर्ट वर्शन है। रिपोर्ट बताती हैं कि इस डील में शामिल हर एक विमान की कीमत लगभग 40 मिलियन डॉलर हो सकती है, और ढाका को उम्मीद है कि अगस्त 2026 तक इस खरीद को अंतिम रूप दे दिया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि केवल बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देश जैसे इंडोनेशिया भी अब रूस और अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करते हुए चीन की ओर रुख कर रहे हैं। इंडोनेशिया ने भी कम से कम 42 चेंगदू J-10 फाइटर जेट्स खरीदने की इच्छा जताई है।
भारत की पैनी नज़र और 'प्लान-बी' तैयार
इस पूरे घटनाक्रम पर भारत सरकार बेहद सतर्कता से नज़र बनाए हुए है। लोकसभा में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने पूर्व में सदन को आश्वस्त करते हुए कहा था कि भारत सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर डालने वाली सभी गतिविधियों पर पैनी नज़र रखती है। हालांकि, बांग्लादेश की सेना के मिलिट्री ऑपरेशन्स के डायरेक्टर ने एक प्रेस ब्रीफिंग में दावा किया था कि फिलहाल लालमोनिरहाट एयरफ़ील्ड का इस्तेमाल किसी सैन्य उद्देश्य के लिए करने की योजना नहीं है, लेकिन कूटनीति और रक्षा जगत में 'दावों' से ज्यादा 'तैयारियों' पर भरोसा किया जाता है।
चीन अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) नीति के तहत भारत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश में जुटा है। ऐसे में बांग्लादेश का चीन के साथ रक्षा, बुनियादी ढांचे और व्यापार में सहयोग बढ़ाना दक्षिण एशिया में हवाई-शक्ति के संतुलन को पूरी तरह बदल सकता है। भारत अपनी सीमाओं की संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है, क्योंकि ड्रैगन की हर चाल पर नई दिल्ली की 'तीसरी आंख' चौबीसों घंटे तैनात है।
पाकिस्तान कनेक्शन ने बढ़ाई बेचैनी
दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान वायु सेना पहले से 36 J-10CE फाइटर जेट संचालित कर रही है। ऐसे में यदि बांग्लादेश भी इसी प्लेटफॉर्म को अपनाता है, तो भारत के सामने दो अलग-अलग दिशाओं में समान प्रकार की हवाई क्षमता मौजूद हो सकती है। रक्षा विशेषज्ञ इसे संभावित "डुअल-फ्रंट एयर डायनामिक" के रूप में देखते हैं। हालांकि इसका अर्थ तत्काल सैन्य खतरा नहीं है, लेकिन भारतीय रणनीतिक योजनाकारों के लिए यह एक ऐसा परिदृश्य है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दक्षिण एशिया में बदलता शक्ति संतुलन
यह सौदा केवल विमान खरीदने का मामला नहीं है। इसके पीछे चीन और बांग्लादेश के बढ़ते रक्षा संबंध, क्षेत्रीय प्रभाव की राजनीति और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की कहानी छिपी है। यदि अगस्त 2026 तक यह समझौता अंतिम रूप ले लेता है, तो बंगाल की खाड़ी से लेकर भारत की पूर्वी सीमाओं तक सुरक्षा समीकरणों में नया अध्याय जुड़ सकता है। फिलहाल सवाल यह नहीं है कि बांग्लादेश J-10CE खरीदेगा या नहीं, बल्कि यह है कि इन विमानों की तैनाती और चीन की भूमिका दक्षिण एशिया के भविष्य को किस दिशा में मोड़ेगी। और यही वह सवाल है, जिसका जवाब नई दिल्ली बेहद करीब से तलाश रही है।


