बेंगलुरु के सैयद गुलाब 10 सालों से 5 सरकारी अस्पतालों के 250 मरीजों व परिजनों को रोज मुफ्त भोजन दे रहे हैं। उन्होंने 'रोटी चैरिटी ट्रस्ट' बनाया है। इस नेक काम में वे हर महीने 1.2 लाख रुपये खर्च करते हैं।

बेंगलुरु में हर दिन हजारों लोग अपने काम और परिवार की उलझनों में भागते-दौड़ते नजर आते हैं। लेकिन इसी शहर में पिछले करीब 10 सालों से एक शख्स बिना किसी दिखावे के सैकड़ों लोगों का पेट भर रहा है। सैयद गुलाब हर दिन कम से कम 250 मरीजों और उनके परिवार वालों को मुफ्त में खाना खिलाते हैं और अब उनका यह सेवा भाव लोगों का ध्यान खींच रहा है।

एक रविवार से शुरू हुई थी यह पहल

सैयद गुलाब ने 29 मार्च 2016 को एक रविवार के दिन मुफ्त खाना बांटना शुरू किया था। दरअसल, उनके एक दोस्त की बेटी अस्पताल में भर्ती थी। तब उन्होंने देखा कि इलाज के लिए दूर-दराज से आए परिवारों को खाने के लिए कितनी परेशानी उठानी पड़ रही है। इसके बाद उन्होंने हर रविवार को खाना बांटना शुरू किया, जो धीरे-धीरे हर दिन की रूटीन बन गया। पिछले करीब एक दशक से वह इस काम को लगातार कर रहे हैं।

5 सरकारी अस्पतालों के मरीजों और उनके परिवारों को मिल रही मदद

जयनगर के करीब एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले पांच सरकारी अस्पतालों के मरीजों और उनके तीमारदारों को इस सेवा का फायदा मिल रहा है। इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ, राजीव गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चेस्ट डिजीज, संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉमा एंड ऑर्थोपेडिक्स, किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी और निम्हांस (NIMHANS) में आने वाले कई लोगों के लिए गुलाब का यह मुफ्त खाना किसी वरदान से कम नहीं है।

अस्पताल में इलाज के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के साथ-साथ कर्नाटक के अलग-अलग हिस्सों से भी परिवार आते हैं। कई दिनों तक अस्पताल में रुकने की वजह से उनके पैसे खत्म हो जाते हैं। गुलाब बताते हैं कि खासकर रविवार के दिन अस्पताल की कैंटीन बंद रहने से लोगों को और ज्यादा दिक्कत होती थी।

कोरोना काल में भी नहीं रुकी सेवा

कोरोना महामारी के मुश्किल वक्त में भी गुलाब ने अपनी सेवा बंद नहीं की। सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए उन्होंने प्लेट में खाना देने के बजाय पैक्ड फूड बांटना शुरू कर दिया। इसी दौरान उन्होंने झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों को राशन किट भी बांटे। कुछ अस्पताल अधिकारियों और आस-पास की कैंटीन वालों ने जब इस पर आपत्ति जताई, तो दोस्तों की सलाह पर गुलाब ने 'Roti Charity Trust' नाम से एक रजिस्टर्ड एनजीओ (NGO) बना लिया। खाने की क्वालिटी और सुरक्षा के लिए उन्होंने FSSAI का लाइसेंस भी ले लिया है।

हर महीने खर्च होते हैं करीब ₹1.2 लाख

गुलाब एक प्लास्टिक मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री चलाते हैं। वह अपने इस नेक काम के लिए हर महीने करीब ₹1.2 लाख अपनी जेब से खर्च करते हैं। हर दिन का खाना बनाने के लिए करीब 30 किलो चावल, 8 किलो मसूर दाल और 8 किलो मौसमी सब्जियों का इस्तेमाल होता है। मरीजों और उनके साथ आए लोगों की सेहत को ध्यान में रखते हुए मेन्यू एकदम सादा रखा गया है। आमतौर पर घी राइस या सादे चावल के साथ वेजिटेबल सांभर परोसा जाता है।

अब उनके पास एक अलग किचन और खाना बनाने वाला स्टाफ भी है। डोनर्स की मदद से भी यह सेवा लगातार चल रही है। सोशल मीडिया के जरिए गुलाब के इस काम के बारे में जानकर कई लोग उन्हें लगातार डोनेशन दे रहे हैं।

'जितना हो सके, उतना करें'

अपनी इस सेवा के बारे में बात करते हुए गुलाब कहते हैं, 'मुझसे जितना हो सकता है, चलो कुछ तो करें।' बस इसी सोच के साथ शुरू किया गया यह काम इतने सालों से लगातार चल रहा है। बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में बिना किसी बड़े प्रचार के, हर दिन सैकड़ों मरीजों और उनके परिवारों को खाना खिलाने की यह पहल अब हर किसी का दिल जीत रही है।