Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग बेटे के व्यवहार को कंट्रोल न कर पाने भर से ससुर को घरेलू हिंसा कानून में जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जानिए कोर्ट की पूरी बात।
शादी टूटने की कगार पर पहुंचती है तो विवाद सिर्फ पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता। कई बार ससुराल के दूसरे सदस्य भी कानूनी लड़ाई में शामिल हो जाते हैं। लेकिन क्या केवल इसलिए ससुर को घरेलू हिंसा के मामले में आरोपी बनाया जा सकता है कि उन्होंने अपने बालिग बेटे के वैवाहिक आचरण को नहीं रोका? दिल्ली हाई कोर्ट के हालिया आदेश ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।
ससुर पर क्या आरोप लगाया गया था?
मामला एक महिला की याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने अपने ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के तहत कार्रवाई की मांग की थी। महिला का आरोप था कि उसके अलग रह रहे पति का दूसरी महिला के साथ संबंध था और उसके ससुर ने बेटे के इस व्यवहार के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। निचली अदालत के फैसले के बाद मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा।
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कोर्ट ने क्यों नहीं मानी ससुर की जिम्मेदारी?
जस्टिस मधु जैन ने कहा कि किसी पिता को केवल इस आधार पर घरेलू हिंसा कानून के तहत जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि वह अपने वयस्क बेटे के व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर पाया। अदालत ने पाया कि कथित वैवाहिक misconduct में ससुर की कोई भागीदारी सामने नहीं आई।
सिर्फ रिश्ता होना काफी नहीं
कोर्ट ने Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 की धारा 3 के संदर्भ में कहा कि घरेलू हिंसा में शारीरिक या मानसिक नुकसान अथवा उसके खतरे के साथ मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार भी शामिल हो सकता है। लेकिन केवल यह तथ्य कि आरोपी और महिला के बीच घरेलू संबंध है, अपने आप धारा 3 लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
‘अपमान’ और ‘धमकी’ के लिए तथ्य भी जरूरी
महिला की ओर से ससुर के व्यवहार को अपमान, मजाक उड़ाने, बेइज्जती या धमकी जैसे शब्दों में बताया गया था। लेकिन कोर्ट के अनुसार इन निष्कर्षों के समर्थन में ठोस तथ्य नहीं दिए गए थे। इसलिए मामले में ससुर की ओर से मौखिक या भावनात्मक घरेलू हिंसा का आधार नहीं बन पाया। कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, जबकि पति के खिलाफ कार्यवाही इससे प्रभावित नहीं हुई।
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