Denial of Sexual Intimacy Cruelty: सुप्रीम कोर्ट ने किन परिस्थितियों में यौन संबंधों से इनकार को मानसिक क्रूरता माना? 15 साल से अलग रह रहे इस डॉक्टर दंपति के मामले में कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल क्यों किया? 'Irretrievable Breakdown of Marriage' यानी विवाह के अपरिवर्तनीय रूप से टूट जाने का सिद्धांत क्या है और कोर्ट ने इसे कैसे लागू किया?
Denial of Sexual Intimacy Cruelty: भारत में विवाह को सिर्फ सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि जीवनभर के साथ का वचन माना जाता है। लेकिन जब दो लोग वर्षों तक अलग-अलग जिंदगी जीने लगें, एक-दूसरे के जीवन में उनकी कोई वास्तविक भूमिका न रह जाए और वैवाहिक संबंध केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाए, तब क्या कानून ऐसे रिश्ते को अनंत काल तक बनाए रखने के लिए मजबूर कर सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल पर एक अहम फैसला सुनाते हुए 18 साल पुरानी शादी को खत्म कर दिया। अदालत ने कहा कि वैवाहिक जीवन में लंबे समय तक शारीरिक और भावनात्मक दूरी, वैवाहिक जिम्मेदारियों का निर्वहन न करना और यौन संबंधों से लगातार इनकार जैसी परिस्थितियां मानसिक क्रूरता का रूप ले सकती हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि जब विवाह पूरी तरह टूट चुका हो और पुनर्मिलन की कोई संभावना न बची हो, तो ऐसे रिश्ते को सिर्फ कानूनी औपचारिकता के तौर पर जीवित रखना उचित नहीं है।
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क्या था पूरा मामला?
यह मामला सोनल तलपड़े बनाम वीरभान सिंह से जुड़ा है। दोनों की शादी 5 दिसंबर 2007 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुई थी। पत्नी गुजरात के सरकारी अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिस्ट) थीं, जबकि पति राजस्थान सरकार की सेवा में डॉक्टर थे।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, शादी के बाद दोनों पति-पत्नी कुल मिलाकर केवल दो से तीन महीने ही साथ रह पाए। इसके बाद उनके बीच दूरी बढ़ती चली गई और पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से दोनों अलग-अलग रह रहे थे। विवाह से कोई संतान भी नहीं हुई।
पति ने अदालत में आरोप लगाया कि उन्हें वैवाहिक जीवन में मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा और पत्नी ने कभी वास्तविक रूप से वैवाहिक संबंध निभाने की इच्छा नहीं दिखाई। दूसरी ओर पत्नी लगातार विवाह को बचाने की बात करती रहीं और तलाक का विरोध करती रहीं।
अदालत ने क्यों माना कि रिश्ता खत्म हो चुका है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वैवाहिक विवादों को केवल तकनीकी कानूनी धाराओं के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। अदालत को यह भी देखना होता है कि दोनों पक्षों ने अपने वैवाहिक दायित्वों का किस हद तक निर्वहन किया।
पीठ ने पाया कि पति-पत्नी के बीच सहजीवन (cohabitation) बेहद सीमित रहा और विवाह के शुरुआती दौर में ही दोनों के विचार, जीवनशैली और वैवाहिक अपेक्षाएं एक-दूसरे से पूरी तरह अलग थीं। दोनों में से किसी ने भी लंबे समय तक रिश्ते को पुनर्जीवित करने के लिए प्रभावी प्रयास नहीं किए।
'यौन संबंधों से इनकार भी मानसिक क्रूरता हो सकता है'
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने वैवाहिक जीवन में शारीरिक निकटता और दांपत्य संबंधों के महत्व पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब पति-पत्नी लंबे समय तक अलग रहें, वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो जाएं और दांपत्य जीवन का कोई वास्तविक अस्तित्व न रह जाए, तो यह स्थिति मानसिक क्रूरता का रूप ले सकती है।
अदालत ने माना कि विवाह केवल एक कानूनी अनुबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और शारीरिक साझेदारी भी है। यदि यह साझेदारी वर्षों तक पूरी तरह खत्म हो जाए, तो उसका प्रभाव दोनों पक्षों के मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर पड़ता है।
15 साल तक अलग रहने को कोर्ट ने माना अहम तथ्य
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति और पत्नी ने अलग-अलग पेशेवर और भौगोलिक रास्ते चुन लिए थे। दोनों अपने-अपने राज्यों में नौकरी कर रहे थे और पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय तक उनके बीच वैवाहिक जीवन जैसा कोई वास्तविक संबंध नहीं रहा।
अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में "डेजर्शन" यानी परित्याग को केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं माना जा सकता। जब दोनों पक्ष लंबे समय तक अलग जीवन जीते रहें और रिश्ते को बचाने का कोई ठोस प्रयास न करें, तो यह विवाह के ढांचे का सामूहिक परित्याग बन जाता है।
समझौते की हर कोशिश रही नाकाम
फैमिली कोर्ट, राजस्थान हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर भी दोनों को साथ लाने की कोशिश की गई। मध्यस्थता और सुलह की प्रक्रियाएं अपनाई गईं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका। अदालत ने माना कि दोनों के बीच संबंध इतने तनावपूर्ण हो चुके हैं कि पुनर्मिलन की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।
अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर खत्म किया विवाह
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए विवाह को समाप्त कर दिया। पीठ ने कहा कि यह रिश्ता व्यवहारिक रूप से पहले ही खत्म हो चुका है। ऐसे में इसे सिर्फ कागजों पर जीवित रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक पीड़ा और निराशा को बढ़ाने जैसा होगा। फैसले में अदालत ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि लंबे समय तक चलने वाली वैवाहिक मुकदमेबाजी अक्सर विवाह को केवल "कागजी रिश्ता" बनाकर छोड़ देती है। मृतप्राय संबंध को लगातार ढोना व्यक्ति के सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक विकास में बाधा बन सकता है।
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