1997 में पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करने वाले धर्मेंद्र प्रधान आज खुद उसी मुद्दे पर घिरे हैं। CJP का आंदोलन तेज है, इस्तीफे की मांग जारी है। क्या इतिहास अब बड़ा राजनीतिक मोड़ लेने वाला है?
Dharmendra Pradhan Resignation: समय का चक्र जब घूमता है, तो इतिहास की कुछ ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो वर्तमान के शासकों को आईना दिखाने लगती हैं। आज जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान देश के सबसे बड़े NEET-UG पेपर लीक विवाद के चक्रव्यूह में घिरे हैं और चारों तरफ से उनके इस्तीफे की मांग गूंज रही है, ठीक उसी मोड़ पर 29 साल पुराना एक सनसनीखेज अतीत बाहर आ गया है। 'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' की एक पुरानी न्यूज़ रिपोर्ट और उनके पुराने साथियों के दावों ने एक ऐसा खुलासा किया है जिसे जानकर हर कोई हैरान है। साल 1997 में, जब धर्मेंद्र प्रधान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के एक युवा और आक्रामक राष्ट्रीय सचिव थे, तब उन्होंने खुद ओडिशा की तत्कालीन सरकार के खिलाफ एक विशाल छात्र आंदोलन का बिगुल फूंका था। वजह बिल्कुल यही थी-सचिवालय के ठीक सामने पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आक्रोश!
1500 छात्र, पुलिस का लाठीचार्ज और फ्रैक्चर: धर्मेंद्र प्रधान की बेरहमी से पिटाई का वो मंजर
उत्कल यूनिवर्सिटी में धर्मेंद्र प्रधान के जूनियर रहे प्रशांत राउत ने उस दौर की खौफनाक यादों की परतें खोलते हुए बताया कि 1997 में जब ओडिशा में पेपर लीक का मामला सामने आया था, तो धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में लगभग 1,500 छात्र सचिवालय का घेराव करने पहुंचे थे। प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था, लेकिन सत्ता के इशारे पर पुलिस ने छात्रों पर बर्बरता से लाठियां बरसानी शुरू कर दीं। राउत याद करते हुए बताते हैं, "हम सब बहुत डरे हुए थे। उस खूनी लाठीचार्ज में धर्मेंद्र प्रधान को पुलिस ने बुरी तरह पीटा था। उन्हें गंभीर चोटें आईं और शरीर में कुछ फ्रैक्चर भी हुए थे।" पूर्व बीजेपी नेता देवेंद्र प्रधान (जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट में काम किया था) के बेटे धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों के हक के लिए उस वक्त जो दर्द झेला था, आज वही अतीत उनके वर्तमान के सामने आकर खड़ा हो गया है।
2021 से शिक्षा की कमान, पर आज कुर्सी पर मंडराया इतिहास का सबसे बड़ा खतरा
साल 2004 में अपने पिता की देवगढ़ लोकसभा सीट से पहली बार संसद पहुंचने वाले धर्मेंद्र प्रधान ने राजनीति में एक लंबा सफर तय किया है। 2021 में उन्हें देश का शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया था, जबकि इससे पहले वे पेट्रोलियम, कौशल विकास और इस्पात जैसे भारी-भरकम मंत्रालयों का कार्यभार संभाल चुके थे। संबलपुर से बीजेपी सांसद प्रधान के लिए यह कार्यकाल उनके जीवन की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा बन चुका है। जो नेता कभी खुद पेपर लीक के खिलाफ खून बहाकर छात्रों का मसीहा बना था, आज उसी नेता की नाक के नीचे हुए कथित NEET घोटाले ने पूरे देश के युवाओं को सड़कों पर ला दिया है। दिल्ली में सुरक्षा कारणों से 16 मेट्रो स्टेशन बंद करने पड़े हैं और चारों तरफ सिर्फ उनके इस्तीफे की मांग उठ रही है।
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CJP का वो अचूक चक्रव्यूह: "इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं!"
इस पूरे आंदोलन की कमान संभाले 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) ने केंद्रीय मंत्री के खिलाफ मोर्चा पूरी तरह से खोल दिया है। आंदोलन अब एक देशव्यापी मुहिम का रूप अख्तियार कर चुका है। CJP के प्रमुख नेता आशुतोष रांका ने गुरुवार को बेहद कड़े शब्दों में कहा कि यह आंदोलन पिछले डेढ़ महीने से पूरे देश को जगा रहा है। रांका ने दावा किया, "जंतर-मंतर पर पिछले 33 दिनों से हज़ारों लोग डटे हुए हैं और देश भर में लाखों लोग इस अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं। यह इस आंदोलन की बहुत बड़ी कामयाबी है।" उन्होंने सरकार को सीधे शब्दों में चेतावनी दी कि प्रदर्शनकारी किसी भी गोलमोल बातचीत के पक्ष में नहीं हैं।
आखिर कब थमेगा यह सस्पेंस? बातचीत के न्यौते पर प्रदर्शनकारियों का तीखा प्रहार
जैसे-जैसे यह सियासी गतिरोध बढ़ रहा है, सस्पेंस गहराता जा रहा है कि क्या धर्मेंद्र प्रधान अपनी कुर्सी बचा पाएंगे? CJP नेता आशुतोष रांका ने सरकार द्वारा बातचीत की पेशकश पर सीधा और तीखा सवाल दागते हुए कहा, "हमारी मांगें 20 जुलाई को ही पूरी तरह साफ हो चुकी थीं, फिर हमारा समय क्यों बर्बाद किया जा रहा है? हम सिर्फ और सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा चाहते हैं। क्या सरकार उन्हें कैबिनेट से हटाएगी या नहीं? आप एक कैबिनेट मंत्री को सस्पेंड नहीं कर सकते, तो फिर ये बातचीत आखिर किस बारे में है?" एक तरफ प्रधानमंत्री फास्ट-ट्रैक कोर्ट की बात कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ छात्र मंत्री के हटने तक पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। देखना यह है कि अतीत में छात्रों के लिए लाठियां खाने वाले प्रधान, वर्तमान के इस छात्र आक्रोश के सामने क्या कदम उठाते हैं!
राजनीतिक संदेश या ऐतिहासिक विडंबना?
धर्मेंद्र प्रधान का 1997 का छात्र आंदोलन और 2026 का मौजूदा विवाद अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। समर्थक इसे उनके छात्र राजनीति के संघर्ष की याद बताते हैं, जबकि आलोचक इसे जवाबदेही का सवाल मान रहे हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि 1997 का आंदोलन और वर्तमान NEET विवाद अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग घटनाओं से जुड़े हैं। दोनों की समानता केवल इतना है कि दोनों में पेपर लीक का मुद्दा चर्चा का केंद्र रहा।
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