Weather Updates: मई 2026 में शुरू हुए El Nino ने भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया भर के बारिश के पैटर्न को कैसे प्रभावित किया है, इसके वैज्ञानिक कारण और आंकड़े जानें।
Global Rainfall Patterns: प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी यानी El Niño का असर इस साल दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर देखने को मिला है। यह जलवायु घटना मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी है। 2026 में El Niño विकसित होने के साथ ही इसके भारत के मानसून पर संभावित असर को लेकर भी नजर रखी गई। NOAA ने जून 2026 में El Niño के विकसित होने की पुष्टि की थी।
भारत में जून से सितंबर तक चला दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से 12.6% कम रहा। IMD के अनुसार देश में इस दौरान 759.4 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य औसत 868.6 मिमी है। यह 2001 के बाद चौथा सबसे कम मानसूनी वर्ष रहा।
El Niño कैसे बदलता है बारिश का पैटर्न?
El Niño के दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसके साथ वायुमंडलीय दबाव और हवा के सामान्य प्रवाह में बदलाव होता है। यही बदलाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बादल बनने और बारिश के वितरण को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि El Niño का असर हर बार और हर जगह समान नहीं होता। NOAA भी स्पष्ट करता है कि घटना की तीव्रता और किसी क्षेत्र पर उसके वास्तविक प्रभाव के बीच सीधा और निश्चित संबंध नहीं होता।
भारत में क्यों कमजोर पड़ा मानसून?
भारत के लिए El Niño को आम तौर पर कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून से जोड़ा जाता है। IMD के अनुसार El Niño के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून सामान्य से कमजोर रहने की प्रवृत्ति होती है और इसका प्रभाव घटना की तीव्रता पर भी निर्भर करता है। हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में इसका असर अलग हो सकता है।
2026 में भी यही क्षेत्रीय अंतर देखने को मिला। देश में कुल बारिश कम रही, लेकिन कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई। उदाहरण के लिए, कोलकाता और दक्षिण बंगाल में मानसून के दौरान बारिश राष्ट्रीय रुझान से अलग रही।
अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया तक बदलता है मौसम
El Niño का प्रभाव सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहता। प्रशांत महासागर में समुद्र और वायुमंडल की परिस्थितियों में बदलाव के कारण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत कई क्षेत्रों में बारिश के सामान्य पैटर्न में बदलाव देखा जा सकता है।
आम तौर पर El Niño के दौरान इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियां और अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में अधिक बारिश की संभावना देखी जाती है। लेकिन 2026 के आंकड़े बताते हैं कि वास्तविक स्थिति क्षेत्रीय मौसम प्रणालियों के कारण इससे अलग भी हो सकती है।
2026 में क्यों दिखी अलग-अलग तस्वीर?
इस साल भारत में कुल मानसूनी बारिश कम रही, लेकिन पूरे देश में एक जैसा असर नहीं पड़ा। IMD के आंकड़ों में भी क्षेत्रीय असमानता स्पष्ट रही। पंजाब, अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय में लगातार कम बारिश दर्ज की गई, जबकि कुछ दूसरे क्षेत्रों में बारिश ने कमी की भरपाई की।
यही वजह है कि El Niño को किसी एक देश या पूरे महाद्वीप में बारिश बढ़ाने या घटाने वाला सीधा कारण मानना सही नहीं होगा। समुद्री तापमान, हवाओं, स्थानीय मौसम प्रणालियों और अन्य जलवायु घटनाओं का भी इसमें योगदान होता है।
El Niño का असर आगे भी दिख सकता है
सितंबर 2026 की NOAA रिपोर्ट के मुताबिक El Niño लगातार मजबूत हो रहा था और उत्तरी गोलार्ध की शरद एवं सर्दियों में इसके बहुत मजबूत स्तर पर पहुंचने की संभावना 90% से अधिक आंकी गई थी। रिपोर्ट में पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में 3°C से अधिक की असामान्यता दर्ज होने की बात कही गई।
इसका मतलब है कि El Niño का प्रभाव मानसून खत्म होने के बाद भी वैश्विक मौसम पैटर्न में दिखाई दे सकता है। हालांकि किसी खास इलाके में बारिश, सूखा या तापमान कैसा रहेगा, इसे केवल El Niño के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
