SIR विवाद पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा कि तीनों प्रमुख आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे। जानिए फॉर्म-6, मतदाता सत्यापन, ECINet और CEC पर आयोग ने क्या जवाब दिया।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। आयोग ने जवाबी हलफनामे में कहा है कि SIR से जुड़े अहम आदेश तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए थे। साथ ही, आयोग ने अपने संवैधानिक अधिकारों और मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया का भी बचाव किया है।
तीनों चुनाव आयुक्तों ने सर्वसम्मति से लिए फैसले?
26 अक्टूबर 2026 को दाखिल हलफनामे के मुताबिक, जून 2025, अक्टूबर 2025 और मई 2026 में जारी किए गए SIR से संबंधित तीनों आदेश सर्वसम्मत फैसले थे। आयोग ने कहा कि फाइल पर काम करते समय मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) या अन्य चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियों, सवालों और सुझावों को अपने आप अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 का हवाला देते हुए मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के अपने अधिकार का उल्लेख किया। उसका कहना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना जरूरी है।
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SIR में नोटिस, सुनवाई और फॉर्म-6 पर क्या कहा?
हलफनामे में कहा गया है कि जिन मतदाताओं के विवरण का पुरानी सूची से मिलान नहीं हो पाता या जिनके रिकॉर्ड में विसंगति होती है, उन्हें ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
आयोग के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम सूची से मैप नहीं हो पाए हैं, उनके दस्तावेज जुटाने के लिए बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर जा सकते हैं। सुनवाई केवल विशेष मामलों में होगी। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 में संशोधन नहीं किया गया है। ऑनलाइन आवेदन में फॉर्म-6 और SIR घोषणा-पत्र को अलग-अलग दिखाने की व्यवस्था की जानी थी।
ECINet, अधिकारियों और याचिका पर आयोग का रुख
आयोग ने कहा कि ECINet के जरिए किसी मतदाता का नाम संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के बिना न जोड़ा जा सकता है और न हटाया जा सकता है। नियमों के अनुपालन की जांच के लिए IIT और IISc के विशेषज्ञों की समिति बनाए जाने का भी उल्लेख किया गया है।
हलफनामे में मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर सवाल उठाने वाली याचिका की सुनवाई-योग्यता को भी चुनौती दी गई है। आयोग का कहना है कि CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी है। हालांकि, यह आयोग का पक्ष है; मामले में अदालत का अंतिम निर्णय अलग से देखा जाना होगा। आयोग ने दशहरा अवकाश के कारण संक्षिप्त जवाब दाखिल करने और विस्तृत बिंदुवार जवाब देने की अनुमति मांगी है।
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