Global Recession 2026: दुनिया में मंदी का खतरा कम होने के संकेत मिल रहे हैं। भारत की GDP ग्रोथ 7.8%, चीन की 4.5% और अमेरिका की 3.4% रही। जानिए IMF का ग्लोबल इकोनॉमी पर ताजा अनुमान।
दुनिया में मंदी की आशंकाओं के बीच तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से ऐसी खबर आई है, जिसने वैश्विक बाजारों को राहत दी है। भारत की विकास दर 7.8 फीसदी तक पहुंच गई है, वहीं चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाओं ने भी उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। खास बात यह है कि पश्चिम एशिया में युद्ध, महंगाई और कारोबार पर दबाव के बावजूद इन देशों की आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दुनिया मंदी के खतरे से बाहर निकल रही है? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के ताजा अनुमान भी आने वाले साल में वैश्विक विकास दर में सुधार का संकेत दे रहे हैं।
भारत सबसे आगे, चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्था ने भी दिखाई रफ्तार
तीनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के ताजा आंकड़े देखें तो भारत की स्थिति सबसे मजबूत नजर आती है। अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। मजबूत घरेलू खपत, निवेश और मैन्युफैक्चरिंग ने इसमें अहम योगदान दिया।
वहीं चीन की अर्थव्यवस्था जुलाई-सितंबर 2026 में 4.5 फीसदी की दर से बढ़ी, जो पिछली तिमाही के 4.3 फीसदी से बेहतर है। दूसरी ओर अमेरिका की GDP तीसरी तिमाही में 3.4 फीसदी की सालाना दर से बढ़ी, जबकि दूसरी तिमाही में यह आंकड़ा 2.2 फीसदी था। अमेरिकी ग्रोथ को उपभोक्ता खर्च, निवेश और सरकारी खर्च से सहारा मिला।
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IMF ने भी दिया राहत का संकेत, 2027 में बढ़ सकती है ग्लोबल ग्रोथ
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अक्टूबर 2026 की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक अर्थव्यवस्था 2026 में 3.1 फीसदी की दर से बढ़ सकती है। 2027 में इसके 3.4 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है। हालांकि, राहत के साथ महंगाई की चुनौती भी बनी हुई है। IMF ने 2026 में वैश्विक महंगाई 4.7 फीसदी रहने और 2027 में घटकर 4.1 फीसदी होने का अनुमान लगाया है। यानी आने वाले साल में कीमतों का दबाव कुछ कम हो सकता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिलने की उम्मीद है।
मंदी का खतरा अभी टला नहीं, इन चुनौतियों पर रहेगी नजर
भले ही बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के आंकड़े राहत दे रहे हों, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव से सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। वहीं पश्चिम एशिया का संघर्ष और रूस-यूक्रेन युद्ध कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा ऊंची ब्याज दरें, सरकारी कर्ज और महंगाई भी निवेश तथा आम लोगों की खरीदने की क्षमता पर दबाव डाल रहे हैं। इसलिए बेहतर GDP आंकड़ों को मंदी पूरी तरह खत्म होने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल भारत, अमेरिका और चीन की मजबूती ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को सहारा जरूर दिया है।
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