Energy Security India: कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने हेतु भारत, ब्राजील व अमेरिका पेट्रोल में इथेनॉल मिला रहे हैं। ब्राजील और अमेरिका 1970 के दशक से इसके प्रमुख उत्पादक हैं। भारत का लक्ष्य 2025 तक 20% और 2030 तक 30% इथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल करना है।
India Ethanol Policy: देश में अब E85 फ्यूल की बिक्री शुरू हो गई है। E20 फ्यूल तो पहले से ही मिल रहा है। सरकार का मकसद साफ है - विदेशों से आने वाले कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना। आने वाले समय में पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा और बढ़ाई जाएगी। इस बीच, देश में इथेनॉल के फायदे और नुकसान पर बहस छिड़ी हुई है। लेकिन, भारत अकेला देश नहीं है जो इथेनॉल को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। दुनिया के कई देश, खासकर ब्राजील और अमेरिका, इस दिशा में दशकों पहले ही काम शुरू कर चुके हैं।

ब्राजील ने 1970 के दशक में ही इथेनॉल की ताकत को पहचान लिया था। 1973 के तेल संकट के बाद, देश ने पेट्रोल पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई। इसी के तहत, 1975 में ब्राजील सरकार ने "प्रो-एल्कोहल" (Proálcool) नाम का एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया। इसका मकसद गन्ने से इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाकर पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करना था। शुरुआत में पेट्रोल में 10 से 25 फीसदी तक इथेनॉल मिलाया गया। 1970 और 1980 के दशक में, ब्राजील ने सिर्फ इथेनॉल से चलने वाली गाड़ियां भी बनाईं। सरकारी मदद और सब्सिडी के कारण ये गाड़ियां काफी पॉपुलर हुईं। हालांकि, बाद में तेल की कीमतें गिरने और इथेनॉल की कमी के चलते इनकी लोकप्रियता घट गई।
फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियों ने तस्वीर बदल दी
2003 में ब्राजील ने फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां (FFV) पेश कीं, और इसने पूरी तस्वीर बदल दी। ये गाड़ियां किसी भी अनुपात में इथेनॉल और गैसोलीन के मिश्रण पर चल सकती थीं। इस टेक्नोलॉजी ने इथेनॉल इंडस्ट्री में नई जान फूंक दी और लोगों का भरोसा भी बढ़ाया। 2008 तक, ब्राजील में बिकने वाली 80 फीसदी से ज्यादा नई कारें फ्लेक्स-फ्यूल वाली थीं। आज भी ब्राजील में E18 से लेकर E27.5 तक इथेनॉल मिला गैसोलीन अनिवार्य है। आज ब्राजील इथेनॉल का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है।
अमेरिका में इथेनॉल का सफर
ब्राजील की तरह ही, अमेरिका भी इथेनॉल उत्पादन में एक बड़ा खिलाड़ी है। अमेरिका में इथेनॉल का इस्तेमाल 20वीं सदी की शुरुआत से ही हो रहा है, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल 1970 के दशक में शुरू हुआ। शुरुआत में इसका इस्तेमाल लैंप जलाने के लिए होता था, बाद में गाड़ियों में भी होने लगा। अमेरिका ने मुख्य रूप से मक्के से बनने वाले इथेनॉल पर ध्यान दिया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इसका उत्पादन कम हो गया था, लेकिन 1970 के दशक के तेल संकट ने इथेनॉल को फिर से चर्चा में ला दिया। तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए, अमेरिकी सरकार ने इथेनॉल को बढ़ावा दिया। 1978 के एनर्जी पॉलिसी एक्ट में इथेनॉल फ्यूल पर टैक्स छूट दी गई, जिससे इसके उत्पादन और इस्तेमाल में बढ़ोतरी हुई।
2005 बना एक बड़ा मोड़
अमेरिकी इथेनॉल प्रोग्राम को सबसे बड़ा बूस्ट 2005 में मिला, जब रिन्यूएबल फ्यूल स्टैंडर्ड (RFS) लागू किया गया। इसने गैसोलीन में एक तय मात्रा में इथेनॉल मिलाना अनिवार्य कर दिया। बाद में 2007 के एनर्जी इंडिपेंडेंस एंड सिक्योरिटी एक्ट ने और भी बड़े लक्ष्य तय किए। अमेरिका में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला गैसोलीन E10 है। E15 और E85 जैसे मिश्रण भी उपलब्ध हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल सीमित है। आज अमेरिका दुनिया में इथेनॉल का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। वहां इथेनॉल नीति ऊर्जा सुरक्षा, ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।
भारत का तेजी से बढ़ता सफर
ब्राजील और अमेरिका से सबक लेते हुए, भारत ने 2003 में इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम शुरू किया। भारत ने 2021-22 में 10 फीसदी इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल कर लिया। बाद में इसे 2022-23 में 12.06 फीसदी और 2023-24 में 14.06 फीसदी तक बढ़ाया गया। अब लक्ष्य जुलाई 2025 तक 20 फीसदी ब्लेंडिंग का है। सरकार का कहना है कि 2014-15 से 2025 तक पेट्रोल की जगह इथेनॉल का इस्तेमाल करके देश ने लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई है। भारत का अगला बड़ा लक्ष्य 2030 तक पेट्रोल में 30 फीसदी इथेनॉल मिलाना है। इससे तेल आयात और कम होगा, किसानों की आय बढ़ेगी और पर्यावरण को भी फायदा होगा।
