India First Algae Tree: भोपाल में देश का पहला एल्गी ट्री लगाया गया है, जो 25 पेड़ों जितनी हवा साफ करने की क्षमता रखता है। माइक्रो एल्गी और सोलर एनर्जी से चलने वाली यह तकनीक प्रदूषण से लड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। जानिए कैसे काम करता है एल्गी ट्री।
What Is Algae Tree: तेजी से बढ़ते प्रदूषण, घटती हरियाली और दम घोंटती हवा के बीच भारत ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नया कदम उठाया है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में देश का पहला ‘एल्गी ट्री’ लगाया गया है। यह अनोखी तकनीक न केवल हवा को साफ करने का दावा करती है, बल्कि कम जगह में ज्यादा असर दिखाने की वजह से इसे भविष्य की स्मार्ट ग्रीन टेक्नोलॉजी भी माना जा रहा है।

सोशल मीडिया पर इस ‘एल्गी ट्री’ की तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। लोग इसे “भविष्य का पेड़” और “मशीन वाला ऑक्सीजन प्लांट” तक कह रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक असली पेड़ों की जगह नहीं ले सकती, लेकिन प्रदूषित शहरों में यह एक बड़ा सहायक विकल्प जरूर बन सकती है।
क्या है एल्गी ट्री?
नाम सुनकर भले ही यह किसी सामान्य पेड़ जैसा लगे, लेकिन असल में एल्गी ट्री एक हाईटेक मशीन है। यह एक पारदर्शी टैंक की तरह दिखाई देता है, जिसके अंदर पानी और माइक्रो एल्गी भरी होती है। यही माइक्रो एल्गी इस पूरी तकनीक का सबसे अहम हिस्सा है। यह मशीन आसपास की हवा को अंदर खींचती है और फिर माइक्रो एल्गी तथा फोटो-बायोरिएक्टर तकनीक की मदद से कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में बदलने का काम करती है। आसान भाषा में समझें तो यह एक तरह का “मिनी एयर क्लीनर” है, जो प्राकृतिक प्रक्रिया को तकनीक के जरिए तेज और नियंत्रित तरीके से इस्तेमाल करता है।
यह भी पढ़ें: “10 रुपये का डायपर लीक नहीं होता…” NEET पेपर लीक पर खान सर का फूटा गुस्सा
25 पेड़ों जितना असर करने का दावा
रिपोर्ट्स के मुताबिक एक एल्गी ट्री सालभर में करीब 1.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसकी क्षमता लगभग 20 से 25 बड़े पेड़ों के बराबर मानी जा रही है। यही वजह है कि पर्यावरण विशेषज्ञ इसे शहरी इलाकों के लिए गेमचेंजर तकनीक बता रहे हैं। खासतौर पर उन शहरों में जहां जगह की कमी के कारण बड़े स्तर पर पेड़ लगाना मुश्किल हो चुका है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
एल्गी ट्री फोटो-बायोरिएक्टर तकनीक पर आधारित है। इसमें मौजूद माइक्रो एल्गी सूरज की रोशनी का इस्तेमाल कर कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में बदल देती है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक पेड़ों में होने वाले प्रकाश संश्लेषण जैसी ही होती है, लेकिन मशीन के जरिए इसे ज्यादा नियंत्रित तरीके से किया जाता है। इसके अलावा यह तकनीक हवा में मौजूद धूल और छोटे प्रदूषक कणों को फिल्टर करने में भी मदद करती है। यानी यह केवल ऑक्सीजन ही नहीं बनाती, बल्कि हवा की गुणवत्ता सुधारने का भी काम करती है।
सोलर एनर्जी से चलता है एल्गी ट्री
इस मशीन की एक खास बात यह भी है कि यह सोलर एनर्जी पर आधारित है। इसके ऊपर सोलर पैनल लगाए गए हैं, जो पंप, सेंसर और LED सिस्टम को बिजली देते हैं। रात के समय भी यह मशीन बैटरी बैकअप और LED लाइट की मदद से काम कर सकती है। इससे इसकी ऊर्जा खपत काफी कम हो जाती है और इसे पर्यावरण के अनुकूल तकनीक माना जा रहा है।
किन जगहों पर लगाया जा सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि एल्गी ट्री खासतौर पर भीड़भाड़ और ज्यादा प्रदूषण वाले इलाकों में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है। इसे बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, मार्केट, पार्क, मॉल और ट्रैफिक सिग्नल जैसे स्थानों पर लगाया जा सकता है। बड़े शहरों में जहां हरियाली के लिए पर्याप्त जगह नहीं बची है, वहां यह तकनीक हवा की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकती है।
क्या यह असली पेड़ों की जगह ले सकता है?
हालांकि एल्गी ट्री को लेकर उत्साह काफी ज्यादा है, लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि यह असली पेड़ों का विकल्प नहीं हो सकता। नेचुरल पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि मिट्टी को सुरक्षित रखते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं, छाया देते हैं और जैव विविधता को भी बनाए रखते हैं। ऐसे में एल्गी ट्री को एक सपोर्टिव टेक्नोलॉजी के रूप में देखा जा रहा है, न कि प्राकृतिक पेड़ों के विकल्प के तौर पर।
भविष्य के शहरों की नई पहचान बन सकती है तकनीक
भारत समेत दुनिया के कई देशों में अब स्मार्ट और सस्टेनेबल सिटी मॉडल पर तेजी से काम हो रहा है। ऐसे में एल्गी ट्री जैसी तकनीकें आने वाले समय में शहरी विकास का अहम हिस्सा बन सकती हैं। भोपाल में इसकी शुरुआत को एक प्रयोगात्मक लेकिन महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अगर इसके परिणाम सकारात्मक रहे, तो आने वाले वर्षों में देश के दूसरे बड़े शहरों में भी इस तकनीक का इस्तेमाल बढ़ सकता है।
यह भी पढ़ें: आपके मोबाइल पर आया ये SMS? तुरंत करें चेक, वरना रुक सकती है LPG Subsidy
