पंजाब कांग्रेस के संगठनात्मक फेरबदल में मनीष तिवारी को जिम्मेदारी नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने 45 साल की सेवा का जिक्र करते हुए एक्स पर लिखा, 'काश मेरे पास असुरक्षा की दवा होती, जो होगा सो होगा।' 

Manish Tiwari X Post: पंजाब कांग्रेस में साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर शुरू हुआ महा-मंथन अब एक सियासी अखाड़े में तब्दील हो चुका है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी ($AICC$) द्वारा पंजाब के लिए की गई नई संगठनात्मक नियुक्तियों ने राज्य की राजनीति में एक ऐसा सस्पेंस पैदा कर दिया है, जिसने पार्टी के भीतर सुलग रहे असंतोष को हवा दे दी है। इस पूरे फेरबदल की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक, चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी को किसी भी समिति या सांगठनिक जिम्मेदारी में जगह नहीं दी गई। पार्टी के इस अप्रत्याशित कदम के तुरंत बाद मनीष तिवारी का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स ($X$) पर एक ऐसा रहस्यमयी और तीखा पोस्ट साझा किया, जिसने दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक कांग्रेस आलाकमान के गलियारों में खलबली मचा दी है।

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'काश मेरे पास असुरक्षा की दवा होती...' आखिर किस ओर था मनीष तिवारी का इशारा?

मनीष तिवारी ने अपनी उपेक्षा पर खुलकर नाराजगी जताने के बजाय बेहद कूटनीतिक लेकिन तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने 'हाशिए पर गए मनीष तिवारी' शीर्षक वाले एक अखबार के लेख को साझा करते हुए लिखा: "काश मेरे पास व्यक्तियों और संस्थाओं की असुरक्षाओं का कोई इलाज या दवा होती! फिर भी, कांग्रेस ने पिछले 45 वर्षों में मुझे बहुत कुछ दिया है और मैंने दशकों से अपना पूरा जीवन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सेवा में समर्पित किया है। अब जो होगा सो होगा (What will be, will be)।" मनीष तिवारी का यह बयान साफ इशारा करता है कि पार्टी के भीतर कुछ ताकतें ऐसी हैं जो उनके बढ़ते कद से 'असुरक्षित' महसूस कर रही हैं। 45 साल तक पार्टी की सेवा में अपनी जवानी खपाने वाले नेता का यह कहना कि 'जो होगा सो होगा', कांग्रेस के भविष्य के लिए किसी बड़े तूफान का संकेत माना जा रहा है।

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45 साल की सेवा का जिक्र, लेकिन संगठन में नहीं मिली जगह

मनीष तिवारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। वह चंडीगढ़ से वर्तमान सांसद हैं और इससे पहले पंजाब के आनंदपुर साहिब तथा लुधियाना से भी लोकसभा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। पार्टी में चार दशक से अधिक समय बिताने वाले तिवारी को पंजाब कांग्रेस के नए संगठनात्मक ढांचे में कोई जिम्मेदारी नहीं मिलने से राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। उनकी पोस्ट में "45 वर्षों की सेवा" और "जो होगा सो होगा" जैसे शब्दों ने यह संकेत जरूर दिया कि वह फैसले से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं, हालांकि उन्होंने खुलकर नाराज़गी जाहिर नहीं की।

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2027 चुनाव से पहले कांग्रेस ने किन नेताओं पर जताया भरोसा?

इस पूरे विवाद की जड़ बुधवार को $AICC$ के महासचिव केसी वेणुगोपाल द्वारा जारी की गई वो प्रेस विज्ञप्ति है, जिसे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की हरी झंडी के बाद तत्काल प्रभाव से लागू किया गया। पंजाब फतह करने के लिए बनाई गई इन नई समितियों में बड़े चेहरों को तो जगह मिली, लेकिन तिवारी का नाम गायब रहा:

  • चुनाव प्रचार समिति: पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को इसका अध्यक्ष बनाया गया है।
  • कोर कमेटी: सुखजिंदर सिंह रंधावा को इस बेहद पावरफुल कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
  • चुनाव प्रबंधन एवं समन्वय समिति: विजय इंदर सिंगला को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
  • घोषणापत्र समिति: अमर सिंह इस समिति का नेतृत्व करेंगे।

इसके अलावा, अमरिंदर सिंह राजा वारिंग पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे और प्रताप सिंह बाजवा विधायक दल के नेता (CLP) रहेंगे। पार्टी ने सुखविंदर सिंह डैनी, राज कुमार वेरका और संगत सिंह गिलजियान के रूप में तीन नए कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किए हैं।

तीन बार के सांसद और शून्य जिम्मेदारी: आखिर आलाकमान ने क्यों चली यह चाल?

राजनीतिक विश्लेषकों के लिए सबसे बड़ा सस्पेंस यही है कि आखिर लुधियाना, आनंदपुर साहिब और अब चंडीगढ़ से तीन बार के लोकसभा सांसद मनीष तिवारी जैसे कद्दावर चेहरे को पूरी तरह नजरअंदाज क्यों किया गया? मनीष तिवारी केवल पंजाब ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस का एक मुखर और पढ़ा-लिखा चेहरा माने जाते हैं। पंजाब में पार्टी को जमीन से उठाकर खड़ा करने का दावा करने वाले नेता को जब उनके अपने ही राज्य की चुनावी रणनीति से बाहर कर दिया जाता है, तो सवाल उठना लाजिमी है। सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या यह फैसला पंजाब कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी का नतीजा है, या फिर आलाकमान तिवारी को कोई अलग संदेश देने की कोशिश कर रहा है?

'जो होगा सो होगा'-पंजाब कांग्रेस में आने वाले नए सियासी तूफान का आगाज?

मनीष तिवारी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पंजाब कांग्रेस पहले ही अंदरूनी खींचतान से जूझ रही है। अतीत में भी जब-जब वरिष्ठ नेताओं ने 'असुरक्षा' और 'पार्टी के लिए जीवन खपाने' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, उसके परिणाम बड़े सियासी उलटफेर के रूप में सामने आए हैं। चंडीगढ़ के मौजूदा सांसद का यह सस्पेंस भरा रुख यह साफ करता है कि वे चुप बैठने वाले नहीं हैं। 'जो होगा सो होगा' कहकर उन्होंने गेंद पूरी तरह से आलाकमान के पाले में डाल दी है। अब देखना यह होगा कि क्या कांग्रेस नेतृत्व समय रहते मनीष तिवारी की इस 'दवा' की तलाश करता है, या फिर पंजाब में साल 2027 की चुनावी नैया सजने से पहले ही पार्टी के भीतर एक नया विद्रोह जन्म ले लेता है।