Pakistan Banyan Tree Viral: पाकिस्तान के लांडी कोतल में बरगद का पेड़ 1898 से जंजीरों में बंधा है। कहानी के मुताबिक नशे में ब्रिटिश अधिकारी ने इसे ‘गिरफ्तार’ करने का आदेश दिया था।

Pakistan Arrested Banyan Tree: अपराधियों को जंजीरों में बंधा देखना आम बात है, लेकिन क्या आपने कभी किसी पेड़ को जंजीरों में बंधा देखा है? पाकिस्तान के खैबर दर्रे के पश्चिमी छोर पर बसे ऐतिहासिक शहर लांडी कोतल में एक बरगद का पेड़ आज भी भारी जंजीरों में बंधा हुआ है। खास बात यह है कि पेड़ पर लगे एक बोर्ड पर लिखा है- “मैं गिरफ्तार हूं।”

यह नजारा जितना अजीब लगता है, इसके पीछे की कहानी उससे भी ज्यादा दिलचस्प है। कहा जाता है कि यह घटना साल 1898 की है, जब यह इलाका ब्रिटिश शासन के अधीन था। इस कहानी में औपनिवेशिक दौर, स्थानीय इतिहास और एक कथित नशे में धुत ब्रिटिश अधिकारी का अजीब आदेश शामिल है।

लांडी कोतल में जंजीरों से बंधा है बरगद का पेड़

आज पाकिस्तान में मौजूद लांडी कोतल खैबर दर्रे के पश्चिमी छोर पर स्थित एक ऐतिहासिक शहर है। यहां एक बरगद का पेड़ भारी जंजीरों से जमीन से बांधा गया है। पेड़ के पास एक बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है- “मैं गिरफ्तार हूं।” पेड़ को देखकर पहली नजर में यह किसी मजाक या अजीबोगरीब कहानी का हिस्सा लगता है। लेकिन स्थानीय तौर पर इस पेड़ से जुड़ी कहानी एक सदी से भी ज्यादा समय से सुनाई जाती रही है। कहानी के मुताबिक, यह पेड़ साल 1898 से जंजीरों में बंधा हुआ है। बताया जाता है कि उस समय ब्रिटिश भारत में तैनात एक अधिकारी ने इसे “गिरफ्तार” करने का आदेश दिया था।

नशे में अधिकारी को लगा, पेड़ उनकी ओर बढ़ रहा है

  • इस घटना की सबसे चर्चित कहानी के मुताबिक, जेम्स स्क्विड नाम का एक ब्रिटिश अधिकारी कथित तौर पर नशे में था। उस दौरान उसे लगा कि बरगद का पेड़ उसकी तरफ बढ़ रहा है।
  • अधिकारी ने कथित तौर पर एक मेस सार्जेंट को आदेश दिया कि पेड़ को गिरफ्तार कर लिया जाए। इसके बाद पेड़ को भारी जंजीरों से बांध दिया गया, ताकि वह कहीं भाग न सके।
  • खैबर राइफल्स के पूर्व मेस सेक्रेटरी कैप्टन नासिर फारूक के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अधिकारी को लगा था कि पेड़ हिल रहा है और शायद वह लांडी कोतल से निकलकर पेशावर की तरफ “भाग” सकता है।
  • इसी कहानी को पेड़ के पास लगी पट्टिका भी बताती है। इसमें दावा किया गया है कि नशे में धुत ब्रिटिश अधिकारी के आदेश पर पेड़ को गिरफ्तार कर जंजीरों में बांध दिया गया था।

1898 में पाकिस्तान नहीं, ब्रिटिश भारत का हिस्सा था इलाका

  • इस घटना को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को समझना भी जरूरी है। 1898 में पाकिस्तान नाम का कोई स्वतंत्र देश नहीं था। लांडी कोतल और आसपास का इलाका ब्रिटिश भारत का हिस्सा था।
  • लांडी कोतल की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण थी। यह खैबर दर्रे के पश्चिमी छोर पर स्थित है। खैबर दर्रा भारतीय उपमहाद्वीप और अफगानिस्तान के बीच आने-जाने वाले प्रमुख रास्तों में से एक रहा है।
  • नेशनल आर्मी म्यूज़ियम भी लांडी कोतल को खैबर दर्रे के पश्चिमी मुहाने पर स्थित एक महत्वपूर्ण ब्रिटिश चौकी के तौर पर बताता है। इसलिए उस समय यह क्षेत्र केवल एक सामान्य कस्बा नहीं था, बल्कि सैन्य और रणनीतिक नजरिए से बेहद अहम माना जाता था।

1897 में खैबर इलाके में हुई थी भारी अशांति

  • पेड़ की कहानी का समय भी काफी महत्वपूर्ण है। इसके ठीक एक साल पहले, यानी 1897 में खैबर इलाके में भारी अशांति हुई थी। उस दौरान अफरीदी कबीले के लोगों ने लांडी कोतल सहित ब्रिटिश चौकियों पर हमले किए थे।
  • इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने इस सीमावर्ती इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत की। इसके कुछ समय बाद, 1899 तक खैबर राइफल्स को लांडी कोतल और खैबर दर्रे की दूसरी महत्वपूर्ण चौकियों पर तैनात कर दिया गया था।
  • ऐसे माहौल में पेड़ को गिरफ्तार करने की यह कहानी सिर्फ एक मजेदार किस्सा नहीं रह जाती। इसे उस समय की मजबूत ब्रिटिश सैन्य व्यवस्था और औपनिवेशिक सत्ता के एक अजीब उदाहरण के तौर पर भी देखा जाता है।

पेड़ न भाग सकता था, न अधिकारी के आदेश का विरोध कर सकता था

  • कहानी का सबसे अजीब हिस्सा यही है कि पेड़ के खिलाफ लगाए गए आरोप का कोई मतलब नहीं था। वह न तो खुद चल सकता था और न ही किसी अधिकारी के आदेश को समझ सकता था। फिर भी उसे जंजीरों से बांध दिया गया।
  • स्थानीय स्तर पर इस घटना को कई बार औपनिवेशिक सत्ता के एक छोटे लेकिन प्रतीकात्मक उदाहरण के रूप में देखा जाता है। एक अधिकारी ने कथित तौर पर एक स्थिर पेड़ की ओर इशारा किया, उसे गिरफ्तार करने का आदेश दिया और उस आदेश को भी मान लिया गया।
  • पेड़ ने न विरोध किया और न ही कहीं जाने की कोशिश की। इसलिए जंजीरें वहीं रह गईं।

एक मजाकिया घटना से ज्यादा है पेड़ की कहानी

  • पहली नजर में यह पूरा मामला किसी मजाक जैसा लगता है। ऐसा लगता है जैसे किसी नशे में धुत अधिकारी ने पेड़ को हिलते हुए देखा और मान लिया कि वह कहीं भागने वाला है।
  • लेकिन जब इस घटना को उस समय के खैबर क्षेत्र, ब्रिटिश सैन्य मौजूदगी और औपनिवेशिक शासन के संदर्भ में देखा जाता है, तो यह कहानी एक अलग अर्थ ले लेती है।
  • यह उस दौर की याद दिलाती है जब ब्रिटिश शासन की सत्ता सीमावर्ती इलाकों में बेहद मजबूत थी। एक अधिकारी का आदेश कितना असामान्य क्यों न हो, उसे लागू करने की स्थिति मौजूद थी।

100 साल से ज्यादा बाद भी जंजीरों में खड़ा है पेड़

  • सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस सत्ता के दौर में इस पेड़ को कथित तौर पर “गिरफ्तार” किया गया था, वह सत्ता अब खत्म हो चुकी है। ब्रिटिश साम्राज्य समाप्त हो गया, दक्षिण एशिया का राजनीतिक नक्शा बदल गया और खैबर दर्रे ने कई पीढ़ियों की उथल-पुथल देखी।
  • उसकी जंजीरें अब 1898 में वास्तव में क्या हुआ था, इसका पक्का सबूत होने से ज्यादा एक ऐतिहासिक कौतूहल बन चुकी हैं। पेड़ के पास लगा लकड़ी का बोर्ड, जिस पर लिखा है “मैं गिरफ्तार हूं”, आज भी इस अजीब कहानी की याद दिलाता है।
  • बेशक, किसी पेड़ को कानूनी या वास्तविक अर्थ में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। वह न तो कहीं भाग सकता है और न ही किसी नशे में धुत अधिकारी के आदेश को समझ सकता है। फिर भी, एक सदी से ज्यादा समय गुजर जाने के बाद भी वह जंजीरों में बंधा खड़ा है।