पासपोर्ट से नागरिकता साबित होगी या नहीं? सरकार-विपक्ष आमने-सामने, आखिर सच क्या है? नागरिकता विवाद के बीच नया कानूनी खुलासा, MEA के बयान पर सियासी संग्राम तेज।

Passport Citizenship Controversy: भारतीय नागरिकों की पहचान और उनके वजूद को लेकर देश के इतिहास का सबसे बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। इस महा-संग्राम की शुरुआत विदेश मंत्रालय (MEA) के अधिकारियों के उस चौंकाने वाले स्पष्टीकरण से हुई, जिसने हर आम और खास हिंदुस्तानी को झकझोर कर रख दिया है। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि भारतीय पासपोर्ट सिर्फ यात्रा का एक कानूनी दस्तावेज़ है, नागरिकता का पक्का सबूत नहीं! इस बयान के आते ही देश भर में यह तीखा सवाल गूंजने लगा है कि अगर दुनिया भर में भारत की पहचान बनने वाला नीली किताब जैसा पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है, तो फिर देश में किसी व्यक्ति की नागरिकता का असली 'कागज' कौन सा है?

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'एक्ट 1967' का वो पन्ना: क्या गैर-नागरिकों को भी मिल सकता है भारतीय पासपोर्ट?

जब इस चौकाने वाले दावे पर हंगामा बढ़ा, तो सरकारी सूत्रों और भाजपा ने बचाव में 'पासपोर्ट एक्ट, 1967' का हवाला देकर नया सस्पेंस खड़ा कर दिया। सूत्रों के मुताबिक, नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 12 सालों में नागरिकता या पासपोर्ट को लेकर कोई नया नियम नहीं बनाया है, बल्कि स्थापित कानूनी स्थिति को ही दोहराया है। पासपोर्ट एक्ट, 1967 की धारा 20 एक ऐसा हैरान करने वाला प्रावधान सामने लाती है, जिसके तहत केंद्र सरकार "जनहित" में किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज़ जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक ही न हो! हालांकि, इसी एक्ट की धारा 6(2)(a) कहती है कि यदि आवेदक भारत का नागरिक नहीं है, तो अथॉरिटी पासपोर्ट देने से मना कर देगी। कानूनों के इसी अंतर्विरोध ने पूरे मामले को एक रहस्यमयी पहेली बना दिया है।

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विपक्ष का सबसे बड़ा डर: "मनमाने ढंग से नागरिकता छीनने की है तैयारी!"

जैसे ही यह कानूनी बारीकी सामने आई, विपक्ष ने सरकार के खिलाफ चौतरफा युद्ध का ऐलान कर दिया। कांग्रेस के महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया, "यह सरकार आम नागरिकों के बीच घबराहट और लाचारी की भावना पैदा करने में माहिर है। पासपोर्ट को नागरिकता के दायरे से बाहर रखकर, वे उन भारतीयों को मनमाने ढंग से नागरिकता के अधिकारों से वंचित करने की तैयारी कर रहे हैं जिनसे वे असहमत हैं।" विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार इस अनिश्चितता के जरिए अपने राजनीतिक विरोधियों और कुछ विशेष समुदायों को निशाना बनाना चाहती है।

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पहले 'आधार' और अब 'पासपोर्ट': दोनों ही रेस से बाहर!

इस विवाद ने एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। कुछ समय पहले देश के सबसे बड़े दस्तावेज 'आधार' को लेकर भी ऐसा ही असमंजस था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया था कि आधार सिर्फ पहचान और पते का दस्तावेज है, नागरिकता का पक्का सबूत नहीं। अब इस लिस्ट में पासपोर्ट का नाम भी जुड़ गया है। ऐसे में देश के सामने यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि आखिर किस दस्तावेज पर भरोसा किया जाए? एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार पर तंज कसते हुए कहा, "अगर पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र, आधार और वोटर ID में से कुछ भी पक्का सबूत नहीं है, तो क्या 2030 तक नागरिकता का एकमात्र सबूत सिर्फ बीजेपी की सदस्यता होगी?" वहीं टीएमसी (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा ने भी तंज कसा कि अब तो ऐसा लगता है जैसे केवल सत्ताधारी दल का समर्थक होना ही नागरिकता की एकमात्र गारंटी बची है।

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चुनाव आयोग का ट्विस्ट: 12 वीआईपी दस्तावेजों का वो रहस्य!

इस पूरे सियासी बवंडर के बीच चुनाव आयोग (EC) के अधिकारियों ने एक बेहद दिलचस्प और राहत देने वाली जानकारी साझा की है। आयोग के अनुसार, वोटर लिस्ट के विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत मतदाताओं को अपनी पात्रता साबित करने के लिए जिन 12 मान्य दस्तावेजों की जरूरत होती है, उनमें पासपोर्ट आज भी एक वैध और मान्य दस्तावेज के रूप में शामिल है। बिहार और असम के वोटर लिस्ट संशोधनों में पासपोर्ट के जरिए लोगों के नाम जोड़े और बनाए रखे गए हैं। चुनाव अधिकारियों का कहना है कि जमीनी स्तर पर वोटर रजिस्ट्रेशन के नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जिसने इस गंभीर विवाद में एक नया प्रशासनिक मोड़ ला दिया है।

मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में: क्या है नागरिकता का 'अंतिम सच'?

मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने विदेश मंत्रालय के इस तर्क को पूरी तरह "बेतुका" करार देते हुए सवाल उठाया कि क्या सरकार बिना आश्वस्त हुए ही किसी को भी देश का पासपोर्ट थमा रही है? इस बीच, राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने देश को चेतावनी देते हुए कहा है कि इस भ्रम के कारण बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) किसी भी आम नागरिक की राष्ट्रीयता पर शक करके उसे वोटिंग के अधिकार से बेदखल कर सकता है। सिब्बल ने साफ किया कि "अब यह पूरा संवेदनशील मामला सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर पहुंच चुका है।"

अब सबकी नजर आगे क्या होगा उस पर

प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के पुराने नियमों के मुताबिक, नागरिकता का फैसला 'सिटिजनशिप एक्ट, 1955' और 'नागरिकता नियम, 2009' के तहत जन्म, वंश, रजिस्ट्रेशन और नैचुरलाइजेशन जैसे पांच तरीकों से होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्वीकार्य अंतिम दस्तावेजों की सूची पर अब भी अंतिम फैसला होना बाकी है। अब देखना यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत इस पासपोर्ट-नागरिकता के महा-संकट पर क्या ऐतिहासिक फैसला सुनाती है।