Punjab Drug Crisis Explained: पंजाब में 66 लाख लोगों पर नशे का असर, बढ़ती NDPS कार्रवाई और अदालतों की चिंता के बीच जानिए क्यों दशकों की कोशिशों के बावजूद ड्रग संकट खत्म नहीं हो पाया।

पंजाब में नशे के खिलाफ अभियान कोई नई बात नहीं है। पिछले तीन दशकों में कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक हर सरकार ने "ड्रग्स के खिलाफ जंग" का दावा किया। पुलिस कार्रवाई तेज हुई, स्पेशल टास्क फोर्स बनीं, नशामुक्ति केंद्र खोले गए और तस्करों पर शिकंजा कसने की घोषणाएं हुईं। लेकिन सवाल आज भी वही है, अगर कार्रवाई लगातार हो रही है, तो पंजाब अब भी देश के सबसे बड़े ड्रग संकट से क्यों जूझ रहा है?

आंकड़े बताते हैं कि चुनौती अभी खत्म नहीं हुई

संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 3 करोड़ की आबादी वाले पंजाब में लगभग 66 लाख लोग किसी न किसी रूप में नशे की गिरफ्त में हैं। इनमें 21.36 लाख ओपिओइड उपयोगकर्ता और करीब 6.97 लाख बच्चे भी प्रभावित बताए गए हैं।

रिपोर्ट का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि सरकारी नशामुक्ति केंद्रों में इलाज के बाद स्थायी सुधार की दर करीब 1.5% बताई गई। इससे स्पष्ट होता है कि केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं, बल्कि पुनर्वास व्यवस्था को भी मजबूत करने की जरूरत है।

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कार्रवाई बढ़ी, लेकिन तस्करी का नेटवर्क भी बदला

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से अप्रैल 2026 के बीच पंजाब में 73,541 NDPS मामले दर्ज हुए, जबकि पहले के वर्षों में यह संख्या 52,255 थी। इसी अवधि में 98,596 गिरफ्तारियां हुईं और हेरोइन, अफीम व सिंथेटिक ड्रग्स की बड़ी खेप जब्त की गई।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अधिक बरामदगी दो बातें दिखा सकती है—या तो पुलिस की कार्रवाई प्रभावी हुई है, या फिर राज्य में तस्करी का नेटवर्क अब भी सक्रिय है। हाल के वर्षों में ड्रोन के जरिए सीमा पार से ड्रग्स भेजने और सिंथेटिक नशे की बढ़ती तस्करी ने चुनौती को और जटिल बना दिया है।

केवल गिरफ्तारी नहीं, मजबूत व्यवस्था भी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट और पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट दोनों ने समय-समय पर पंजाब में नशे की समस्या को गंभीर सामाजिक चुनौती बताया है। अदालतों ने जांच प्रक्रिया, फोरेंसिक साक्ष्य, केस की गुणवत्ता और अभियोजन की मजबूती पर भी सवाल उठाए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब को इस संकट से बाहर निकालने के लिए केवल गिरफ्तारियां नहीं, बल्कि बेहतर जांच, वित्तीय नेटवर्क पर कार्रवाई, प्रभावी पुनर्वास, सीमा सुरक्षा और जनजागरूकता को साथ लेकर चलना होगा। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुशासन का भी बड़ा इम्तिहान है।

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