TMC Name Symbol Freeze: चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले TMC के नाम और ‘फूल-घास’ चिह्न पर रोक लगाई। जानिए पैरा 15 क्या है और इस फैसले का शिवसेना विवाद से क्या कनेक्शन है।
TMC Symbol Freeze Case: पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग (EC) ने एक बड़ा अंतरिम आदेश जारी किया है। आयोग ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (AITC) के आधिकारिक नाम और उसके प्रसिद्ध 'फूल और घास' वाले चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है। चुनाव आयोग का यह कदम किसी भी गुट को असली TMC घोषित नहीं करता, बल्कि यह केवल उपचुनाव कराने के लिए एक तात्कालिक प्रशासनिक व्यवस्था है।
TMC Name Symbol Freeze: EC ने क्यों लिया फैसला?
चुनाव आयोग के सामने दोनों गुटों ने खुद को असली TMC बताया है। आयोग ने रिकॉर्ड पर मौजूद दावों के आधार पर माना कि पार्टी में दो विरोधी गुट हैं और दोनों पार्टी की पहचान पर दावा कर रहे हैं। लेकिन यह फैसला TMC पर किसी एक गुट के अंतिम कब्जे की घोषणा नहीं है। आयोग ने साफ किया है कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला Election Symbols Order, 1968 के पैरा 15 के तहत अलग प्रक्रिया पूरी होने के बाद होगा।

आखिर क्यों लगा 'फूल और घास' के निशान पर ब्रेक?
तृणमूल कांग्रेस के भीतर सांगठनिक विवाद तब गहरा गया जब दो अलग-अलग धड़ों ने खुद को असली TMC बताते हुए दावे ठोक दिए। एक गुट की कमान पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ में है, जबकि दूसरे विरोधी गुट का नेतृत्व अरूप रॉय (ऋतब्रत बनर्जी समर्थित) कर रहे हैं। दोनों ही गुटों ने आगामी उपचुनाव के लिए अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिए थे और पार्टी के नाम-निशान पर अपना हक जताया था। EC ने स्पष्ट किया कि उपचुनाव से पहले मुख्य विवाद को विस्तार से सुलझाने का समय नहीं था, इसलिए दोनों पक्षों के साथ निष्पक्षता बरतने के मकसद से यह अंतरिम रोक लगाई गई है।
क्या है पैराग्राफ 15 और इसके कानूनी प्रावधान?
चुनाव आयोग ने यह फैसला 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैराग्राफ 15 (Paragraph 15) का हवाला देते हुए सुनाया है। यह पैराग्राफ आयोग को अधिकार देता है कि जब किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो या अधिक विरोधी धड़े खुद के असली पार्टी होने का दावा करते हैं, तो EC दोनों पक्षों के सबूतों, संगठनात्मक बहुमत और विधायकों-सांसदों की संख्या के आधार पर अंतिम निर्णय लेता है। अंतिम फैसला आने तक मूल नाम और प्रतीक चिह्न को रोककर रखना एक स्थापित कानूनी प्रक्रिया है।
TMC बनाम शिवसेना विवाद: दोनों मामलों में क्या है कनेक्शन?
यह घटनाक्रम साल 2022 के महाराष्ट्र के चर्चित शिवसेना विवाद की याद दिलाता है। उस वक्त एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत के बाद उद्धव ठाकरे और शिंदे गुट दोनों ने शिवसेना के नाम और उसके पारंपरिक निशान 'धनुष-बाण' पर दावा ठोंक दिया था। तब भी अंधेरी ईस्ट उपचुनाव से पहले आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत शिवसेना नाम और सिंबल फ्रीज कर दिया था। बाद में विस्तृत सुनवाई के बाद शिंदे गुट को मूल शिवसेना का नाम व 'धनुष-बाण' सौंपा गया, जबकि उद्धव गुट को नया नाम और 'ज्वलंत मशाल' सिंबल मिला। TMC का मामला भी फिलहाल उसी शुरुआती मोड़ पर है और अंतिम फैसला आना बाकी है।


