अमेरिका ने ईरान पर अपनी कड़ी मांगों को नरम कर दिया है। अब होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने के बदले प्रतिबंधों में ढील देने पर बातचीत हो रही है। यह अस्थायी समझौता दोनों पक्षों को मौजूदा संकट से राहत देगा।

आज से 11 हफ़्ते पहले की ही तो बात है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि ईरान के साथ 'बिना शर्त सरेंडर' के अलावा कोई समझौता नहीं होगा। तब ट्रंप ने कई मांगें रखी थीं- जैसे ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे, बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट रोके और अपना सारा यूरेनियम अमेरिका को सौंप दे। ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया था कि ईरान इस समझौते पर सौ बार दस्तखत करेगा।

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लेकिन अब जो खबरें आ रही हैं, उनसे लगता है कि अमेरिका ईरान के साथ शांति समझौते की बातचीत में ये सब बातें भूल गया है। अमेरिका अपनी पुरानी मांगों से काफी पीछे हट गया है। यूरेनियम, परमाणु खतरा, बैलिस्टिक मिसाइल... इन सब पर अब कोई बात नहीं हो रही है। चर्चा की मेज पर अब सिर्फ एक ही मुद्दा है- होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना। ट्रंप और उनकी टीम का रुख अब 'पहले होर्मुज, बाकी बातें बाद में' वाला हो गया है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही इस बातचीत की पूरी डिटेल अभी तक सामने नहीं आई है। ट्रंप खुद मानते हैं कि दोनों देशों के बीच सारे मुद्दे अभी सुलझे नहीं हैं। फिर भी, वो आने वाले समझौते को 'क्रांतिकारी' बता रहे हैं। इसी बीच, न्यूयॉर्क टाइम्स ने बातचीत में शामिल अमेरिकी अधिकारियों से बात करके समझौते की कुछ शर्तों की रिपोर्ट दी है।

न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि मामला उतना 'क्रांतिकारी' नहीं है, जितना ट्रंप बता रहे हैं। स्थायी शांति, परमाणु मुद्दे और बैलिस्टिक मिसाइल जैसी बातें फिलहाल बातचीत का हिस्सा नहीं हैं। सिर्फ एक शर्त है- होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना। इसके बदले में, अमेरिका ईरान की मांग के मुताबिक उस पर लगे प्रतिबंधों में ढील देगा। मतलब ये कोई पक्का समझौता नहीं, बल्कि होर्मुज को खोलने के लिए एक अस्थायी व्यवस्था है। अब इस पर ईरान के सर्वोच्च नेता मुज्तबा तमेनेई की मंजूरी मिलनी बाकी है। फिर ट्रंप और मुज्तबा इस पर दस्तखत करेंगे।

भले ही ये ट्रंप के लिए एक तरह से पीछे हटना हो, लेकिन मौजूदा हालात में यह उनके लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसा है। अमेरिका में गैसोलीन की कीमतें 4.50 डॉलर प्रति गैलन के करीब पहुंच गई हैं। सर्वे बताते हैं कि ज्यादातर अमेरिकी युद्ध के खिलाफ हैं। यहां तक कि ट्रंप की अपनी रिपब्लिकन पार्टी के लोग भी इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। नवंबर में मध्यावधि चुनाव होने हैं, और ऐसे में ट्रंप और उनकी पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए, ट्रंप का प्लान है कि किसी तरह एक समझौता कर लिया जाए, उसे 'क्रांतिकारी' बताकर फिलहाल अपनी साख बचाई जाए।

ईरान के लिए भी यह स्थिति राहत भरी है। उसे युद्ध की वजह बने मुख्य मुद्दों पर बात नहीं करनी पड़ेगी और न ही किसी धमकी भरे समझौते पर साइन करना होगा। तेल से होने वाली कमाई बंद होने से ईरान की अर्थव्यवस्था जो तबाही के कगार पर थी, उसे भी नई जान मिल जाएगी।

पूरी दुनिया के लिए भी यह एक अच्छी खबर है। दुनिया इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा संकट से उबर सकेगी। एक ऐसा युद्ध जो कभी भी हाथ से निकल सकता था, वो फिलहाल के लिए टल गया है। दुनिया का एक-चौथाई तेल जिस होर्मुज के रास्ते से गुजरता है, उसके फिर से खुलने पर मौजूदा ईंधन संकट कम हो जाएगा।

सच्चाई तो यह है कि दोनों पक्षों के पास समझौते के अलावा कोई और रास्ता बचा ही नहीं था। उन्होंने बुरे विकल्पों में से सबसे कम बुरा विकल्प चुना है। और सबसे मजेदार बात तो यह है कि अगर यह समझौता हो भी गया, तो क्या होगा? हालात फिर से लगभग वहीं पहुंच जाएंगे, जहां 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के समय थे। यानी, इतनी भयानक लड़ाई के बाद भी, कुछ भी नहीं बदला। अब अमेरिकी लोगों के साथ-साथ पूरी दुनिया यही पूछ रही है कि आखिर यह युद्ध हुआ ही क्यों था?