मकर संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला श्रद्धा, परंपरा और रोजगार का संगम है। त्रेतायुगीन परंपरा से जुड़ा यह पर्व सामाजिक समरसता, लोक आस्था और जरूरतमंदों की सेवा का प्रतीक है।

गोरखपुर। मकर संक्रांति के अवसर पर गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का अनोखा संगम है। यह मेला मकर संक्रांति से लगभग पखवारा पहले शुरू होकर एक माह से अधिक समय तक चलता है। सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर महायोगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा पूरी तरह लोक आस्था से जुड़ी हुई है।

गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी के रूप में चढ़ाया गया अन्न वर्षभर जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है। मंदिर का अन्न क्षेत्र इसकी मिसाल है, जहां कोई भी जरूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटता। मान्यता है कि जैसे कोई भी भक्त बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर निराश नहीं होता, वैसे ही मंदिर से कोई भूखा नहीं जाता। इस वर्ष खिचड़ी पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा।

त्रेतायुग से जुड़ी खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा

गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा को त्रेतायुगीन माना जाता है। मान्यता के अनुसार, आदियोगी गुरु गोरखनाथ एक बार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी के दरबार पहुंचे। मां ने उनके लिए अनेक व्यंजनों की व्यवस्था की, लेकिन बाबा ने कहा कि वह योगी हैं और केवल भिक्षा में प्राप्त अन्न ही ग्रहण करते हैं।

उन्होंने मां ज्वाला देवी से पानी गर्म करने का आग्रह किया और स्वयं भिक्षाटन के लिए निकल पड़े। भिक्षा मांगते हुए वह गोरखपुर पहुंचे और राप्ती व रोहिन नदियों के तट पर स्थित जंगल क्षेत्र में धूनी रमाकर साधनारत हो गए। उनके तेज से प्रभावित होकर लोग उनके खप्पर में चावल और दाल दान करने लगे।

मकर संक्रांति के दिन इस अन्न से खिचड़ी बनाई गई और यही परंपरा आगे चलकर खिचड़ी पर्व के रूप में स्थापित हो गई। कहा जाता है कि आज भी ज्वाला देवी मंदिर में बाबा की खिचड़ी पकाने के लिए पानी उबलता रहता है।

मकर संक्रांति पर विशेष पूजा और खिचड़ी अर्पण की परंपरा

मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गोरक्षपीठाधीश्वर नाथ पंथ की परंपरा के अनुसार गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी अर्पित कर समूचे समाज की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, देश के विभिन्न हिस्सों और पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी लाखों श्रद्धालु इस अवसर पर बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने आते हैं।

मकर संक्रांति की भोर में सबसे पहले गोरक्षपीठ की ओर से पीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बाबा को खिचड़ी अर्पित करते हैं। इसके बाद नेपाल राजपरिवार की ओर से लाई गई खिचड़ी चढ़ाई जाती है। फिर मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं और लोक आस्था का यह सिलसिला शुरू हो जाता है।

खिचड़ी मेला 2026: प्रशासनिक तैयारियां और व्यवस्थाएं

खिचड़ी महापर्व को लेकर गोरखनाथ मंदिर और मेला परिसर पूरी तरह सज-संवर कर तैयार है। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर प्रबंधन और प्रशासन की ओर से ठहराव, सुरक्षा और अन्य मूलभूत व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब तक तीन बार खिचड़ी मेले की तैयारियों की समीक्षा कर चुके हैं, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

सामाजिक समरसता का प्रतीक गोरखनाथ मंदिर

गोरखनाथ मंदिर सामाजिक समरसता का ऐसा केंद्र है, जहां जाति, पंथ और मजहब की सीमाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। मंदिर परिसर में हिंदू-मुसलमान सभी समुदायों की दुकानें हैं और बिना किसी भेदभाव के सभी की रोजी-रोटी का इंतजाम होता है।

खिचड़ी मेला भी हजारों लोगों की आजीविका का साधन है। स्थायी दुकानदारों से लेकर अस्थायी मेला व्यापारियों तक, बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इस मेले से जुड़े हैं। उनका कहना है कि यहां कभी भेदभाव नहीं हुआ, बल्कि हमेशा अपनत्व और भाईचारे का भाव महसूस होता है। मेले में खरीदारी, मनोरंजन और लोक संस्कृति के विविध रंग देखने को मिलते हैं, जो इसे सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी बनाते हैं।